कई प्रतापी शासकों के उत्थान और पतन का साक्षी चुनार गढ़ का ऐतिहासिक किला पहचान खोता जा रहा है। राष्ट्रीय पुरातत्व विभाग के अधीन होने के बावजूद संरक्षण के अभाव में इस किले के तमाम परकोटे गिर रहे हैं। कई गुंबदों का नामोनिशान तक मिट गया है। मुगल काल में उत्तर भारत का प्रवेश द्वार माने जाने वाला लगभग पांच हजार वर्ष पुराना यह किला खंडहर होता जा रहा है।
उत्तर वाहिनी गंगा तट पर पहाड़ पर बने चुनार दुर्ग का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व है। देश के पर्यटन मानचित्र में होने और राष्ट्रीय धरोहर होने के कारण देशी एवं विदेशी पर्यटक लगातार यहां इसे देखने आ रहे हैं, लेकिन इसकी दुर्दशा से पर्यटक मायूस होते हैं। टीवी सीरियल चंद्रकांता में चुनार गढ़ दुर्ग का वर्णन होने से इसे देखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है।
इसके मुख्य बुलंद दरवाजे के पास लगे शिलापट्ट से पता चलता है कि हिंदुस्तान पर फतह पाने के लिए इस दुर्ग पर विजय पताका फहराना हुक्मरानों के लिए कितना जरूरी था। तभी तो इस दुर्ग पर चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य से लेकर पृथ्वीराज चौहान, शहाबुद्दीन गौरी, सिकंदर लोदी, बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, औरंगजेब समेत अनेक छोटे बड़े सुल्तान आधिपत्य जमा चुके हैं। ब्रितानिया हुकूमत के दौर में इस पर अंग्रेजों का कब्जा रहा।
गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स का इस पर आजादी के पहले तक कब्जा रहा, जिसका कार्यालय आज भी दुर्ग में उसके शासनकाल का साक्षी है। गुलामी की जंजीर टूटने के बाद इस दुर्ग में बहुत दिनों तक सेना का कब्जा रहा। कालांतर में यह पुलिस ट्रेनिंग सेंटर बना दिया गया। इसे अब यहां से हटाने की कवायद शुरू हो गयी है।बताया जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने बड़े भाई योगिराज भतृहरि के गंगा में समाधि लेने के बाद उनकी स्मृति में इस दुर्ग का निर्माण कराया था। हालांकि इसको लेकर कई किवदंतियां हैं। इतिहासकार बीएल शर्मा के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण काल पांच हजार वर्ष पूर्व का है।
नगर में पैदा हुए प्रसिद्ध साहित्यकार कवि पांडेय बेचन शर्मा उग्र लिखित अपनी खबर से पता चलता है कि मध्ययुगीन सम्राट जरासंध चुनार दुर्ग का उपयोग अपने शत्रुओं को बंदी बनाने के लिए करता था। किले में स्थित भूमिगत सुरंग और तहखाने आज भी इस तथ्य को बल देते हैं। गजेटियर के अनुसार इस दुर्ग का संबंध संदेवा नामक राजा से भी रहा है। संदेवा की पुत्री सोनवा थी।
आज भी दुर्ग में सोनवा मंडप नामक नक्काशीदार इमारत मौजूद है। कहा जाता है कि इन नक्काशी में हीरे जवाहरात जड़े थे, जिसे मुगलों ने लूट लिया। दुर्ग में आज भी बावन खंभा, बावली, सोनवा मंडप, भर्तृहरि समाधि, बंदीगृह, रनिवास, वारेन हेस्टिंग्स दफ्तर, धूपघड़ी, दरबार सहित अनेक ऐतिहासिक इमारत मौजूद है। इसे देखने के लिए देश विदेश से पर्यटक यहां आते हैं।