सीता कुंड पहाड़ पर बंगाली माता की फाइल फोटो ।
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विंध्याचल। अष्टभुजा पहाड़ पर 30 वर्षों से धुनी रमाने वाली बंगाली माता का शरीर शांत हो गया। यह खबर सुनकर उनके अनुयायियों की वहां भीड़ लग गई। उनके परिजन जो कोलकाता में रहते हैं, लाकडाउन के चलते विंध्याचल नहीं पहुंच सके। उन्होंने वीडियो कालिंग के जरिए उनके अंतिम दर्शन किया।
मूल रूप से पश्चिम बंगाल के खरदह निवासी मनीला भौमिक उर्फ बंगाली माता के पति अवनी मोहन भौमिक बैंककर्मी थे। उनके चार पुत्र व तीन पुत्रियां हैं। मां दुर्गा की उपासक बंगाली माता नेपाल में पशुपतिनाथ व उत्तराखंड में कैलाशनाथ का दर्शन करने के बाद मां विंध्यवासिनी का दर्शन करने विंध्याचल आईं थी, इसके बाद दूसरी बार जब 30 वर्ष पूर्व यहां आईं तो अष्टभुजा पहाड़ी को ही साधना स्थल बना लिया। बंगाली माता के हजारों अनुयायी हैं, लेकिन वह अपना काम स्वयं करती थीं। खाना बनाने से लेकर सफाई तक वह स्वयं करती थीं। उनको जूनागढ़ अखाड़े की ओर से आश्रम में ही समाधि दी गई।
उनके शिष्य रोहित त्रिपाठी ने बताया कि बुधवार की सुबह माता ने उठकर स्नान ध्यान करने के बाद पूजा पाठ कर नाश्ता किया। उसके बाद कहा कि अब मैं किसी से नहीं मिलूंगी, जो भी भक्त आ रहा है। उनको मना कर दीजिए, अब उनके पास कोई नहीं आएगा। रात में उन्होंने भोजन भी ग्रहण नहीं किया, सिर्फ जल पीकर रह गईं। बुधवार की रात 8:45 बजे अचानक तबीयत खराब हुई, शिष्यों को जरा सा भी मौका नहीं मिला कि वह डॉक्टर या चिकित्सक के पास लेकर जाएं, कुछ क्षणों में ही उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
बंगाली माता के बारे में यह प्रसिद्ध था कि वह कामरूप कामाख्या से सिद्धी प्राप्त हैं। वह जंगलों में अकेले रहती थी और तांत्रिक अनुष्ठानों की जानकार थीं। माना जाता है कि उनके पास जो कोई भी आता था तो उसकी मनोकामना पूरी होती थी।