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Mirzapur News: हनुमान ने जलाई लंका, सीता की खोज में वन-वन भटके राम

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मिर्जापुर। विभिन्न क्षेत्रों में मंगलवार की देर रात रामलीला का आयोजन हुआ। पहाड़ी ब्लॉक क्षेत्र के धर्मदेवा की रामलीला में गंगा-जमुनी तहजीब की झलक दिखी। रामलीला के मंचन में मुस्लिम कलाकारों ने कई अह्म भूमिका निभाई। रामलीला मंचन के दौरान कहीं फूंकी लंका तो कहीं पर सीता की खोज में राम और लक्ष्मण वन-वन भटकते नजर आए।
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पड़री में पहाड़ी ब्लॉक के धर्मदेवा गांव में रामलीला मंचन के दौरान मंगलवार को लंका दहन प्रसंग का रोमांचक मंचन किया गया। लीला में जहां एक ओर प्रभु श्रीराम के जयघोष से पूरा पंडाल गुंजायमान रहा, वहीं, दूसरी ओर हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल भी देखने को मिली। लंका दहन की लीला की शुरुआत प्रभु की आरती और प्रार्थना से हुई। व्यास मुहम्मद इस्लाम तथा हेमंत मिश्रा ने अपने ओजस्वी संवादों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। बालि वध और लंका दहन जैसे प्रसंगों के मंचन ने दर्शकों को देर तक तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया।
जिगना में श्रीसरस्वती रामलीला समिति सिहौली की ओर से दसवें दिन मेघनाद वध, कुंभकर्ण वध, रावण वध के बाद प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता व हनुमानजी सहित अयोध्या में प्रवेश करते हैं। जहां भरत व नगरवासियों द्वारा आरती उतारी गई। गुरु वशिष्ठ भरत जी के आग्रह पर श्रीराम का राज्याभिषेक किया गया।
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विंध्याचल में मोती झील मार्ग स्थित लीला स्थल पर छठवें दिन माता सीता की खोज के साथ ही जटायु का अंतिम संस्कार, प्रभु से सबरी का मिलन, सुग्रीव मित्रता, बाली वध का जीवंत मंचन किया गया। प्रभु श्री राम और लक्ष्मण सीता की तलाश में वन-वन भटकते रहे। तभी दोनों भाई मरण अवस्था में पड़े जटायु के पास पहुंचे। पूछते हैं हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी तुम देखी सीता मृगनयनी... जटायु ने श्रीराम को रावण के साथ हुए युद्ध का वृत्तांत सुनकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। श्री राम एक पुत्र की तरह जटायु का अंतिम संस्कार करते हैं तथा सीता की खोज में दक्षिण की दिशा की तरफ प्रस्थान कर देते हैं।
लालगंज में हर्दिहा सेमरी मगरदा गांव में चल रही रामलीला में धनुषयज्ञ और सीता स्वयंवर प्रसंग का भव्य मंचन किया गया। जनकपुरी का दरबार जब मंच पर सजा तो लगा मानो मिथिला स्वयं उतर आई हो। रोशनी संगीत और संवादों के बीच जनक दरबार का वैभव दर्शकों को पौराणिक युग में ले गया। मंच पर जब राजा जनक ने घोषणा की कि जो वीर भगवान शिव के धनुष को उठाकर चढ़ा देगा वही सीता का वरण करेगा। यह सुनते ही पूरा मैदान उत्सुकता से भर गया। एक-एक कर अनेक राजकुमार मंच पर आए किसी ने धनुष उठाने की कोशिश की। किसी ने तनिक प्रयास किया पर कोई सफल न हो सका। हर असफल प्रयास पर दर्शकों में रोमांच बढ़ता गया। फिर गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्रीराम मंच पर आए। दर्शकों ने जैसे ही उन्हें देखा पूरा प्रांगण जय श्रीराम के नारों से गूंज उठा। श्रीराम ने सहज भाव से धनुष उठाया। एक क्षण में ही उसे चढ़ाया और टूटने की गूंज के साथ पूरा मंचन भावविभोर हो उठा। उस क्षण की गूंज देर तक दर्शकों के मन में बनी रही। इसके बाद मंच पर सीता ने श्रीराम के गले में वरमाला डालने का दृश्य प्रस्तुत हुआ। पुष्पवर्षा मधुर संगीत और संवादों के बीच जब सीता ने वरमाला डाली तो पूरा प्रांगण जयकारों से गूंज उठा।
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