विश्व में सर्वत्र गीता का समादर है फिर भी यह किसी मजहब या संप्रदाय का साहित्य नहीं बन सकी। भारत में प्रकट हुई गीता विश्व मनीषा की धरोहर है। धार्मिक उथल पुथल को छोड़ कर गुरु चरण में जाने से ही परमलोक परमात्मा का ध्यान लोगाें को होता है। यथार्थ एक भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म का मूल रूप है। ये बातें बरैनी स्थित पप्पू सिंह के अहाते में प्रवचन के दौरान स्वामी अड़गड़ानंद महाराज जी ने कही।
दिव्य सत्संग के दौरान स्वामी अड़गड़ानंद महाराज जी ने कहा कि प्रभु को पाने की नीयत विधि का आचरण ही धर्माचरण है। कण-कण में व्याप्त ब्रम्ह ही सत्य है, उसे विदित करने के अतिरिक्त मुक्ति का कोई अन्य उपाय नहीं है।
स्वामी जी ने कहा कि गीता योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मुखरविंद से नि:सृत अमरवाणी है, उन्होंने इसे विधिवत समझने के लिए किसी तत्वदर्शी के पास जाने को कहा, किसी भाषाविद्, बुद्धिजीवी या गद्दी के संरक्षकाें के पास नहीं। गीता के अनुसार तत्वदर्शी वे हैं जो एकांत में मन को शांत करके भगवान की अनुभूति पाते हैं।
भगवान उनसे बात करते हैं, उन्हें दर्शन देेते हैं और उन्हें अपने में समाहित कर लेते हैं। आज भी जिसने चिंतन करके परमात्मा को विदित कर लिया है या जो उसे विदित करने की कसौटी के करीब हो, धर्म संबंधी प्रश्न उन्हीें से पूछा जा सकता है।
गीता किसी मजहब विशेष के लिए नहीं बल्कि दो हाथ-पैर वाले मानव मात्र की है। भारत धर्मप्राण देश है और यहां के प्रत्येक समस्या के मूल में धार्मिक भ्रांतियां हैं, जिनका समाधान भी धार्मिक होना चाहिए, जो आदिशास्त्र श्रीमद् भगवत् गीता में निहित है, जिसका यथावत् भाष्य यथार्थ गीता है।
इस दौरान आयोजक रमेश सिंह उर्फ पप्पू सिंह, दिनेश सिंह, राजकुमार उपाध्याय, बबलू पंडित, बी राय, रामबाबू सिंह, कृष्ण मोहन सिंह, संतोष सिंह, बबलू सिंह, पवन सिंह सहित यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात सहित कई प्रांताें से भी भक्तजन उपस्थित रहे।