सवा सौ वर्ष पुराना नगर पालिका भवन उत्कृष्ट शिल्पकला का नमूना है। इसमें बेहतरीन पच्चीकारी की गई है। इसका निर्माण घंटाघर के रूप में कराया गया था और इस पर तीन क्विंटल की घड़ी लगाई गई है। शहर की पहचान मानी जाने वाली इस इमारत का निर्माण टाउनहाल के बाद वर्ष 1886 में प्रारंभ हुआ था। तब इसे बनाने के लिए सालाना तीन हजार रुपये का बजट जारी किया जाता था। भवन पांच साल में बनकर तैयार हो गया।
घंटाघर की इमारत का निर्माण शुरू होने के बाद इसके भारीभरकम खर्च पर वाराणसी संभाग के तत्कालीन आयुक्त ने आपत्ति जताई थी। कहा था कि जब कारपोरेशन अर्थाभाव में हो तब सालाना इतनी बड़ी रकम खर्च करने का क्या औचित्य है। इस आपत्ति के बाद सदस्यों ने विचार-विमर्श किया और तय किया गया कि इसका निर्माण पूरा होने तक स्थायी रूप से खर्च वहन किया जाएगा। आखिरकार 11 जुलाई 1891 को किसी तरह इसको पूरा करवा ही लिया गया।
टाउनहाल और घंटाघर के निर्माण का ठेका प्रभाकर लाल दूबे के पास था। इसे अलंकारिक ढंग से बनाया गया है। घंटाघर की दीवारों पर सुंदर और बारीक पच्चीकारी की गई है जो देश की समृद्ध शिल्प कला का एक नमूना है। तीन खंडों में विभक्त यह भवन तीन विभिन्न शिल्प शैलियों में बनाया गया है। घंटाघर के ऊपरी भाग में लगी घड़ी को तत्कालीन सदस्य लाला मोहन लाल ने दिया था। घड़ी का ऊपरी घंटा मिश्रित धातु से बना है, जिसका वजन लगभग तीन सौ किलोग्राम है। इसकी लंबाई तीन फीट और मोटाई पांच इंच तथा व्यास साढे तीन फीट का है। घड़ी की मशीन भले छोटी हो लेकिन पेंडुलम लगभग 20 फीट लंबा है। घड़ी लंदन की मियर्स स्टेन बैंक कंपनी ने इसे सन् 1866 में इसे बनाया था। घंटाघर के निर्माण के लिए विश्वेवश्वर मिस्त्री की नियुक्ति की गई थी। उनकी मृत्यु के बाद शेष कार्यों को पूर्ण करने के लिये एक मार्च 1890 में दरबारी मिस्त्री की नियुक्ति की गई।
प्रथम सचिव की याद में बना घंटाघर
मिर्जापुर। घंटाघर नगर पालिका के प्रथम सचिव एआर पोलक की स्मृति में निर्मित किया गया था। इस सभा भवन के निर्माण पर नगरपालिका तथा राज्य सरकार के अलावा जिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थानों ने सहयोग दिया उसमे कंतित के नरेश भूपेंद्र बहादुर सिंह, महाराज बनारस ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह, कठिनई के रंजीत पांडेय, बड़हर की रानीवेद शरण कुंवर, मेसर्स भोजराज भारामल झंगई लाल, शंभूलाल चौधरी, दिलसुख राय, गुलाब राय, सालिक राम, शिवाराय, तन्नू लाल,शिवराम, खुशहाल चंद, कुंज लाल, विशेश्वर दास, भोलानाथ, काशीनाथ, पालीराम, रामनारायण, तेजपाल, जमुना दास, जीतमल, गिरधारीलाल एवं चंद्रसेन, सुल्तान सिंह साध शामिल रहे।