प्रदेश में सैंड स्टोन, डोलो स्टोन, ग्रेनाइट और अन्य इमारती पत्थरों के खनन के दौरान निकले अनुपयोगी पत्थरों को पीसकर कृत्रिम बालू बनाई जाएगी। कृत्रिम बालू बनाए जाने से जहां नदी से निकलने वाली बालू का विकल्प मिलेगा, वहीं नदियों पर निर्भरता कम होने से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
वरिष्ठ खनन अधिकारी केके राय ने बताया कि भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग ने कृत्रिम बालू निर्माण की नीति जारी कर दी है। इसके मुताबिक कृत्रिम बालू के उत्पादन में इमारती पत्थर की खदानों के पट्टाधारकों को प्राथमिकता दी जाएगी। कृत्रिम बालू के उत्पादन से पहल संयंत्र स्थापित करने वाली फर्म को संपूर्ण देय राशि पर 20 प्रतिशत छूट दी जाएगी। दरअसल, प्रदेश में बालू-मोरंग की उपलब्धता का मुख्य स्त्रोत विभिन्न नदियां हैं, लेकिन नदियों में सभी जगह बालू-मोरंग की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। साथ ही खनन से पर्यावरण और जलीय जीवों को भी नुकसान पहुंचता है। इसे देखते हुए नई नीति बनाई गई है। इससे जहां अनुपयोगी पत्थरों का उपयोग हो सकेगा और कृत्रिम बालूू के रूप में बालू का नया विकल्प मिलेगा।