अहरौरा। साव के दूसरे मंगलवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु डोली लेकर मां भंडारी को मनाने सियूर स्थित उनके मायके पहुंचे। वहां पूजा-पाठ अनुष्ठान के बाद मान-मनौव्वल किया गया। डोली में बैठने के बाद उन्हें विदा कराके मंदिर लाया गया। मां भंडारी के डोली में बैठते ही पूरा वातावरण जय मां भंडारी के जयघोष से गूंज उठा। मंगलवार की सुबह फूलों से सुसज्जित डोली लेकर मंदिर के पुजारी भक्तों के संग खास डीह स्थित भंडारी देवी के पहाड़ से दक्षिण दिशा में छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित सियूर पहाड़ पर पहुंचे।
भंडारी देवी के बारे में आज भी एक परंपरा जीवित है कि भंडारी माता हर तीसरे वर्ष सावन के महीने में अपने मायके चली जाती हैं और तमाम अनुष्ठान-पूजन के बाद उनका डोला पुन: मायके से खास डीह पर स्थित भंडारी देवी के पहाड़ पर आता है। सावन के दूसरे मंगलवार को अहरौरा के सीयूर स्थित पहाड़ पर राजा कर्णपाल के मंदिर में विधि-विधान पूर्वक पूजा-अनुष्ठान किया गया। देवी माता को प्रसन्न करने के लिए वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आरती उतारी गई और प्रसाद का भोग लगाया। मान्यता है कि राजा कर्णपाल मां भंडारी के भाई है। डोला में विदा कराते समय जगह-जगह पर डोला को रोककर भक्त भंडारी मां का पूजन अर्चन करते हैं और प्रसाद का वितरण करते हैं। पथरीले व कंकड़ से भरे रास्ते से होकर नंगे पांव भक्त छह किलोमीटर की दूरी तय करते है। डोला के संग महिलाएं एवं बच्चे भी काफी उत्साह के संग जयकारा लगाते हुए चलते हैं। क्षेत्र के कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मां भंडारी राजा कर्णपाल की बहन हैं। राजा कर्णपाल की बहन के रूप में चर्चित मां भंडारी देवी को प्रत्येक तीसरे वर्ष राजा कर्णपाल के अदृश्य किला बेलखरा के सियूर दक्षिण तरफ स्थित पहाड़ी से डोली में बिठा कर विदा कराकर लाने की प्रथा वर्षों से चली आ रही है। इस संबंध में सबसे खास बात यह है कि मां भंडारी के डोला में बैठते ही डोला का वजन बढ़ जाता है, जिससे यह एहसास होता है कि मां भंडारी डोला में सवार हो चुकी हैं।