शेरवां। विंध्य पर्वत माला की श्रृंखला से जुड़ा इलाका शेरवां-भुईली को महाभारत कालीन शासक राजा भूरीश्रवा की राजधानी के रूप में जाना जाता है। शेरवां एवं भुईली का काशी राज्य के राजनीतिक पटल पर विशिष्ट स्थान रहा है। विकास कराने के नाम पर पूर्ववर्ती सरकारों ने पर्यटन विभाग व पुरातत्व विभाग से कई बार सर्वे तो करवाया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। भारतीय पुरातत्व व सर्वेक्षण विभाग की उदासीनता से शेरवां भुईली के कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवशेष नष्ट होते जा रहे हैं।
महाभारत कालीन शासक राजा भूरीश्रवा की राजधानी शेरवां व भुईली में बताई जाती है। महाभारत की लड़ाई में राजा भूरीश्रवा कौरव सेना की ओर से पांडवों के विरुद्ध लड़ते हुए लडाई में वीरगति को प्राप्त हुआ था। शेरवां में आज भी पहाड़ी के दक्षिण क्षेत्र में बावन बीघे में किले के अवशेष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में बिखरे हैं। क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं होने के बावजूद तमाम सरकारें आईं और चली गईं लेकिन ऐतिहासिक इलाका शेरवां, भुईली, भंडारी देवी का पहाड़ी क्षेत्र विकास पर्यटन की दृष्टि से कोसों दूर है। यहां की ऐतिहासिक धरोहरों पर नजर डालें तो मुगल सम्राट हुमायूं को पराजित करने के पश्चात अफगान शासक शेरशाह सूरी ने अपने अल्पकालिक शासन काल में ही संचार प्रणाली को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से प्रति नौ किमी की दूरी पर डाक चौकियां स्थापित कराई थीं। जो देख-रेख के अभाव में खंडहर के रूप में बदल गई हैं। भुईली गांव के कोट क्षेत्र व शेरवां गांव के पहाड़ पर दक्षिण में पहाड़ी पर जाने के लिए एक सुरंग आज भी दिखाई देती है। किवदंतियां हैं कि यह सुरंग कोट से पहाड़ी के आंतरिक किले को जोड़ती है। शेरवां व भुईली गांव के आधा दर्जन लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करने के चलते स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त है, बावजूद इसके पूरा क्षेत्र विकास की दृष्टि से कोसों दूर है। क्षेत्र के दुर्गेश द्विवेदी, ओमकार यादव, अखिलेश मिश्रा, अमरेश चंद्र द्धिवेदी, शंभूनाथ यादव, शरण शंकर चतुर्वेदी, अजय पांडेय, राधेश्याम, अमित पांडेय, चंद्रभूषण सिंह, कृपाशंकर जायसवाल आदि ने शासन-प्रशासन से क्षेत्र को पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने की मांग की है।