पडऱी। जंग ए आजादी के दौरान अंग्रेजों की क्रूरता इतनी अधिक थी कि नौनिहाल भी क्रांतिकारी बनने को लालायित थे। जिले के पहाड़ी ब्लॉक के ग्राम पंचायत बेलवन के मजरा पकरी का पुरा गांव निवासी जीत नारायण पांडेय भी इन्हीं में से एक थे। वे बालपन से ही क्रांतिकारी रहे। जीत नारायण के अंदर देश भक्ति की भावना कूट कूट कर भरी थी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उन्होंने लोगों को देश भक्ति के प्रति जागरूक किया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया तथा 1940 में छह माह की सजा भी काटे।
पहाड़ी ब्लॉक के पकरी का पुरा गांव निवासी जीत नारायण पांडेय ने देश को आजादी दिलाने में अपनी सक्रिय भूमिका अदा की। स्व. पांडेय ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ते-लड़ते कई बार जेल गए । अंग्रेजों की क्रूरता देख बालक जीत नारायण का खून खौल उठता रहा। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिल कर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया । उनकी प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के गंगापुर में हुई। तत्पश्चात् वह अपने ननिहाल अहरौरा चले आए, जहां क्रांतिकारियों के बीच जीत नारायण स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से जुड़ गए। 13 अगस्त सन् 1942 को अपने साथियों नरेश चंद्र श्रीवास्तव, वि द्या सागर शुक्ल, पुष्कर पांडेय के साथ आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लिया । पहाड़ा रेलवे स्टेशन फूंकने के कांड के बाद जीत नारायण पांडेय को पुलिस ने पकड़ लियाद्घ। अंग्रेजी कोर्ट में मुकदमा चला और उन्हें सात वर्ष की सजा दी गई।1940 में उन्हें छह माह की सजा हुई थी। जेल से छूटने के बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रियता से भाग लिया। 102 वर्ष की अवस्था में पिछले तीन वर्ष पूर्व उन्होंने शरीर छोड़ दिया। वर्तमान समय में गांव पकरी का पुरा में उनके नाम से विद्यालय संचालित होता है। देश की आजादी के लिए जीत नारायण ने जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उसे भुलाया नहीं जा सकता।