मेरठ में तैयार हो रही लेदर की गेंद
- फोटो : Amar Ujala
1994 से गेंद बनाने का कार्य कर रहे महेशचंद प्रधान के लेदर की गेंद बनाने के दो कारखाने हैं। महेशचंद बताते हैं कि उन्होंने पहले शहर में गेंद बनाने का काम सीखा। इसके बाद गांव आकर खुद काम शुरू किया।
धीरे-धीरे काम बढ़ा तो कारीगर रखने शुरू किए। इस समय उनके कारखाने में 65 लोग काम करते हैं। इसके अलावा गांव के ही किरण, अंकित, विनीत भी गेंद बनाने के लद्यु उद्योग चला रहे हैं। गांव में 80 मशीनें हैं। इसके अलावा प्रिंट, मॉडल आदि मशीनें भी लगी हैं।
दक्षिण भारत में भी होती है सप्लाई
गांव के लेदर गेंद की मांग नेपाल में काफी है। इसके अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र हिमाचल प्रदेश, पंजाब में बहुत मांग है। खरीददार सीधा गांव में आकर गेंद की क्वालिटी देखकर ऑर्डर देते हैं। ऑनलाइन बिक्री से इजाफा हुआ है।
क्रिकेट बॉल, मेरठ में बॉल
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सरकार से मिले प्रोत्साहन तो और बेहतर होगा काम
लेदर की गेंद बनाने का कारखाना चलाने वाले लघु उद्यमियों का कहना है कि अगर सरकार हमारे लिए सस्ता ऋण उपलब्ध कराने, तकनीकी दक्षता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माल भेजने के लिए विशेष सुविधा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी होने वाले टेंडर में भागीदारी के लिए विशेष योजना जैसी कुछ सविधाएं मुहैया कराए तो हम और बेहतर करके दिखाएंगे और देश की आर्थिक उन्नति में भागीदार बनेंगे।
मेरठ में तैयार हो रही लेदर की गेंद
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तीन क्वालिटी की गेंद
कलर क्वालिटी वजन ओवर
रेड फस्ट 5.5 ओंस 60 ओवर से अधिक
पिंक सेकेंड 4.5 ओंस 40 ओवर
व्हाइट थर्ड 3.3 ओंस 20 ओवर
मेरठ में तैयार हो रही लेदर की बॉल
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आईपीएल, वर्ल्डकप से बढ़ी मांग
आईपीएल शुरू होने के बाद डिमांड बढ़ी तो गांव में भी गेंद बनाने का काम परवान चढ़ा। अब वर्ल्डकप भारत में हो रहा है तो मांग और भी बढ़ गई है। हर साल गर्मियों की छुट्टियों में मांग बढ़ जाती है।
करीब एक सप्ताह की प्रक्रिया के बाद तैयार होती है गुणवत्तापूर्ण गेंद
चमड़े की धुलाई के बाद उसे एक दिन सुखाया जाता है। फिर रंग और केमिकल डालकर तीन दिन सुखाया जाता है। इसके बाद केमिकल डालकर घिसाई करने के बाद नमी खत्म करने के लिए फिर धूप में सुखाया जाता है। इस प्रकार गेंद बनाने के लिए उपयुक्त चमड़ा तैयार हो जाता है।
चमड़े की कटिंग के बाद अस्तर लगाकर सिलाई की जाती है। इससे यह आधी कटोरी नुमा आकार ले लेता है। इसके बाद मशीन से कटिंग की जाती है। फिर 95 से 100 ग्राम तक का गोला डालकर उसका वजन मापा जाता है। फिर दो कटोरीनुमा भागों को सिला जाता है। उसके बाद हाथ की मशीनों से गेंद को गोल किया जाता है। फिर पेंट कर क्वालिटी चेक की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद लेदर की गेंद बनकर तैयार होती है।