वन्य जीव जंतुओं के व्यवहार पर लगातार अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि तेंदुए सरीखे खतरनाक जानवरों ने भी मानव के समीप रहना सीख लिया है। खास तौर पर वे जानवर जो आबादी के पास से पकड़कर चिड़ियाघर लाए गए हैं। उनके व्यवहार में काफी बदलाव हुआ है। इनकी बदली चाल को देखते हुए विशेषज्ञों ने उन्हें नया नाम ‘वाइल्डोमेस्टिक’ दिया है। इस नाम को शब्दकोष में शामिल करने के लिए आक्सफोर्ड प्रबंधन से भी सिफारिश की गई है।
मेरठ में तेंदुए ने दो बार दस्तक दी। दो साल पहले आया तेंदुआ पकड़ा नहीं जा सका। अहम बात यह है कि उस तेंदुए ने किसी मानव का शिकार नहीं किया था। वह कई दिन शहर में रहा। खुद को फंसता देखकर ही लोगों पर हमला किया। इस तेंदुए ने भी यही किया। उसने अपने बचाव या फिर गुस्से में आकर हमला किया। खुद को फंसता देकर हमला करना तेंदुए का मूल स्वभाव है। कानपुर चिड़ियाघर के विशेषज्ञ इसी पर शोध कर रहे हैं। चिड़ियाघर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. यूसी श्रीवास्तव कहते हैं कि सही बात यह है कि इन जानवरों ने इंसानों के पास रहना सीख लिया है। इंसानी बस्ती के पास आकर भी इंसानों का शिकार न करना और चालाकी से कुत्तों या छोटे जानवरों का शिकार करना, परिवर्तन का संकेत है।
चिड़ियाघर के जानवर नहीं जंगली
डॉ. यूसी श्रीवास्तव का कहना है कि जब जंगल से जानवर चिड़ियाघर लाए जाते हैं तो उनका सही व्यवहार सामने आता है। कानपुर चिड़ियाघर में इस पर लगातार शोध हो रहा है। नतीजों के आधार पर प्रबंधन भी मानने लगा है कि चिड़ियाघर के जानवर पूरी तरह से जंगली नहीं रह जाते हैं।
कहा जाए ‘वाइल्डोमेस्टिक’
वाइल्ड और डोमेस्टिक दोनों शब्दों को मिलाकर ऐसे जानवरों को नया नाम ‘वाइल्डोमेस्टिक’ दिया गया है। डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक इस शब्द को आक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल कराने का आवेदन भी भेजा गया है। शब्द की पूरी परिभाषा विस्तार से समझाई गई है। उन्होंने कहा कि मेरठ से लाए गए तेंदुए के व्यवहार पर भी शोध शुरू हो गया है। साथ ही उसका उपचार भी गंभीरता से किया जा रहा है।