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अनोखी परंपरा: न होलिका दहन, न दुल्हेंडी, जानिए फिर क्यों खेलते हैं तिल्हेंडा

Sat, 03 Mar 2018 12:03 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मदन बालियान, बागपत
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फाइल फोटो
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उत्तर प्रदेश के इन तीन गांवों में अनोखी परंपरा है, कहीं होलिका दहन नहीं होता तो कहीं दुल्हेंडी नहीं खेली जाती। लेकिन इस गांव में तिल्हेंडा खेला जाता है, पढ़िए पूरी खबर...

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देश के तमाम शहरों में आज यानी बृहस्पतिवार को होलिका दहन किया जाएगा। लेकिन यूपी के बागपत में ऐसा भी एक गांव है, जहां पर होलिका दहन नहीं होता। बुजुर्ग बताते हैं कि दो बैल आपस में भिड़ते हुए होलिका में जल गए थे। ग्रामीण बेहद आहत हुए और फैसला किया कि गांव में कभी होलिका दहन नहीं किया जाएगा।

दिल्ली-सहारनपुर हाईवे पर बसा रमाला गांव अनोखी परंपरा का गवाह है। एक तरफ देशभर में होलिका दहन और होली गीतों की धूम मचती है, वहीं इस गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता है। पूर्व प्रधान धर्मपाल चेयरमैन बताते हैं कि सदियों पुरानी परंपरा है। बुजुर्गों ने उन्हें बैलों के होलिका में जल जाने के कारण मौत हो जाने का कारण बताया। आज भी गांव में इस परंपरा को निभाया जा रहा है। 
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ग्रामीण सतवीर सिंह बताते हैं कि होली के दिन गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता है, जबकि दुल्हैंडी जरूर बच्चे खेलते नजर आते हैं। ग्रामीण राम नारायण कहते हैं कि गोवंश के आग में जल जाने के कारण गांव के लोग दुखी हुए और आम राय से यह फैसला लिया गया था। इसी फैसले पर ग्रामीण आज तक अटल हैं। डॉ. वेद प्रकाश, किरण कुमार और विनय कुमार का कहना है कि गोवंश की मौत के शोक में होलिका दहन नहीं करते हैं, लेकिन होली का त्योहार मनाते हैं। गोवंश किसान के लिए पूजा के समान रहे हैं, यही वजह है कि किसानों ने आहत होकर यह फैसला किया होगा।

पढ़ें : PHOTOS: रंग एकादशी पर निकाला जुलूस, होली का हुड़दंग शुरू

भौरा खुर्द में दुल्हेंडी नहीं, खेलते हैं तिल्हेंडा

फाइल फोटो
मुजफ्फरनगर में सिसौली से सटे भौरा खुर्द गांव में होली के रंग जुदा हैं। सिसौली के भाईचारे वाले इस गांव में दुल्हेंडी नहीं खेली जाती है। त्योहार को सिलसिले को तीन दिन तक खींचने की वजह भी निराली। दुल्हेंडी के दिन पड़ोस के सिसौली में निकलने वाली झांकियों (लाग) को देखने के लिए पूरा गांव जाता है। ऐसे में सवाल था कि अब अपने गांव में दुल्हेंडी का मजा कैसे लिया जाए। सदियों पहले तय किया गया कि दुल्हेंडी को सिसौली की होली का आनंद लेंगे और भौरा खुर्द में मनाया जाएगा तिल्हेंडा। यही अब गांव की परंपरा बन गई हैं। प्रोफेसर पंकज बालियान बताते हैं कि भौरा खुर्द के लोग दोपहर तक खेतों से लौट आते हैं, इसके बाद सिसौली पहुंचते हैं। रंगों का असली खेल यहां पर तिल्हेंडा को शुरू होता है।
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सिसौली की होली है सबसे निराली   

फाइल फोटो
मुजफ्फरनगर में किसानों की राजधानी कही जाने वाले सिसौली की होली के रंग भी निराले हैं। कस्बे में एक ही जगह होलिका दहन होता है। दुल्हेंडी के दिन यहां पर एतिहासिक पात्रों की झांकियां निकालने की परंपरा अनूठी है। झांकियां निकालने में प्रत्येक बिरादरी के लोग सहयोग करते हैं, इसमें सामाजिक एकता का संदेश छिपा है। 

सिसौली कस्बे में होली चौक पर ही पूरे कसबे के लोग एकत्र होकर होलिका दहन करते हैं। सदियों से एक ही जगह होलिका डालने और एक साथ मिलकर यहां खुशी मनाने की परंपरा रही है। यहां की दुल्हेंडी में खास रंग हैं। दुल्हेंडी के दिन दोपहर एक बजे तक ही लोग रंग खेलते हैं। इसके बाद यहां पर निकलने वाली झांकियों को देखने के लिए होली चौक पर जमा होने लगते हैं। सड़कों पर पुरुष और छतों पर महिलाओं और बच्चों को जगह दी जाती है। धार्मिक, स्वतंत्रता संग्राम और एतिहासिक पात्रों से जुड़ी झांकियां निकाले जाने की परंपरा हैं। झांकियों में बच्चों को आकर्षक तरीके से सजाकर वाहनों पर लेकर होली चौक का चक्कर लगवाते हैं। कभी रीवा के राजा वीर सिंह बघेल यहां दुल्हेंडी के दिन मुख्य अतिथि रहे थे। 

विदेशी मेहमान यहां की होली देखने कई बार आ चुके हैं। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निकाली झांकी आकर्षण का केंद्र रही थी। प्रत्येक बिरादरी के लाग सहभागिता करते हैं। दुल्हेंडी से एक महीना पहले तैयारियां शुरू हो जाती है। उपेंद्र सिंह बताते हैं कि सदियों से झांकी निकालने की परंपरा है।

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