मेरठ में विक्टोरिया पार्क में 10 अप्रैल 2006 को कंज्यूमर मेला गुलजार था। दिन ढलने लगा था। लोग घरों की तरफ निकलने वाले थे, तभी शाम 5:40 बजे पंडाल में आग लगी और बदहवास लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगे। देखते ही देखते करीब 1500 वर्ग मीटर में लगा पंडाल शोलों में बदल गया। लोहे के मजबूत फ्रेम मोम की तरह पिघलकर गिरने लगे। इस भीषण अग्निकांड में 64 जिंदगियां चलीं गईं। करीब 81 लोग गंभीर रूप से झुलस गए और 85 अन्य आग की चपेट में आए।
इस खौफनाक अग्निकांड को 16 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इन 230 परिवारों की आंखों के सामने आज भी वह खौफनाक मंजर तैरता है। किसी ने पत्नी को खोया तो किसी के सिर से माता-पिता का साया उठ गया। अपनों को याद कर हर कोई भावुक हो जाता है। उम्मीद है कि इंसाफ जरूर मिलेगा। शरीर के जख्म तो भर गए पर अपने से बिछड़ने का गम आज भी ताजा है। पत्नी के साथ मेले में गए मनोज मिश्रा, राकेश गिरधर और राकेश खट्टर बताते हैं कि प्लास्टिक का पंडाल पिघलकर आग का गोला बनकर गिर रहा था। लोग जान बचाने मेन गेट की तरफ भाग रहे थे। आग की लपटों में घिरे कुछ लोग किसी तरह बाहर निकल आए और जमीन पर गिर पड़े। कुछ खुद को बचाने के लिए पास ही पड़े गोबर के ढेर में घुस गए। मेला परिसर के बाहर शहर के लोग भी इकट्ठा हो गए। जिससे जितनी मदद हो सकती थी, सबने की, लेकिन कुछ के लिए बहुत देर हो चुकी थी। मनोरंजन पार्क निवासी नरेश तायल बताते हैं कि शवों की पहचान करना मुश्किल था, जले हुए शरीर देखकर यह अंतर नहीं कर पा रहे थे कि वे पुतले हैं या फिर इंसान।