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यूपी का रण : सियासी दलों की बयार हो जाती है बेकार, मेरठ में ध्रुवीकरण करेगा बेड़ा पार

Sat, 29 Jan 2022 06:15 AM IST
दुष्यंत शर्मा अरीश रिजवी, मेरठ

सार

सबसे बड़ा सवाल, आज कोई सवाल क्यों नहीं है? कहां गए वो तीखे-तीखे, चुभते-चुभते सवाल? क्या उनमें इतनी भी ताकत न थी, कि मांग सकते अपना जवाब। अब तो समीकरण हैं। समीकरणों में मतदाता है। मतदाता की जाति है। धर्म है...। अब तो होड़ है, ये मेरा है...ये मेरा है...। इतना अपनापन! अब तो सब हमदर्द हैं। हमराह हैं। रहनुमा दावे कर रहे हैं, सारे दर्द के मारे अपने हैं! जब शब्दों में इतनी मिठाई घुली हो, तो दर्द भूल ही जाता है। पर, ये दो दिनों का मेला है...। फिर तो हम होंगे, जवाब तलाशते सवाल होंगे...। 
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demo pic - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यह मेरठ शहर है। आमतौर पर यहां के मतदाता राजनीतिक दलों की हवा के साथ नहीं बहते। चुनाव में मुद्दे चाहे जो हों, पर इस सीट पर बूथ तक जाते-जाते मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण हो ही जाता है। इसलिए प्रत्याशी यहां सारे समीकरण ध्रुवीकरण को ध्यान में ही रखकर बनाते हैं। वर्ष 2017 के चुनाव को ही देख लीजिए। भाजपा और नरेंद्र मोदी की प्रचंड लहर थी। अमित शाह ने बड़ी रैली भी की, इसके बावजूद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहते लक्ष्मीकांत वाजपेई हार गए। हालांकि, इन्हीं लक्ष्मीकांत वाजपेई ने वर्ष 2012 में सपा की ऐतिहासिक जीत के बावजूद यहां कमल खिलाया था। दरअसल, मेरठ शहर का अलग मिजाज है। जब सपा को स्पष्ट बहुमत मिला तो भगवा लहराया, मगर मोदी की प्रचंड लहर भी नहीं दिला सकी सीट।

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डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेई यहां से आठ बार चुनाव लड़े। 1989, 1996, 2002 और 2012 में जीते भी। जब-जब यहां मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं हुआ, तब-तब भाजपा की राह मुश्किल हुई। भाजपा ने इस बार वाजपेई के बेहद करीबी रहे नए चेहरे कमलदत्त शर्मा पर दांव लगाया है, तो रालोद के साथ गठबंधन में उतरी सपा ने मौजूदा विधायक रफीक अंसारी पर ही भरोसा जताया है। रफीक की मुश्किल यह है कि बसपा ने यहां दिलशाद शौकत, तो एआईएमआईएम ने भी मुस्लिम प्रत्याशी इमरान अहमद को उतार दिया है। वहीं, कांग्रेस ने रंजन शर्मा और आप ने कपिल शर्मा को प्रत्याशी बनाकर भाजपा की चुनौती बढ़ा दी है। ऐसे में जो भी अपने खेमे के मतदाताओं को लामबंद करने में कामयाब हो जाएगा, जीत का सेहरा उसी के सिर बंधेगा।



ढबाई नगर के मो. शाहिद इन समीकरणों पर पैनी निगाह लगाए हुए हैं। वे कहते हैं, पहले देखेंगे कि मुख्य मुकाबले में कौन-कौन हैं। जो जिताऊ होगा और बदलाव लाएगा, उसी के साथ जाएंगे। निजाम गाजी कहते हैं कि विधायक ऐसा हो जिससे मिलना आसान हो। वहीं, हापुड़ रोड के दुकानदार रोहित कहते हैं योगी सरकार ने पांच साल में सुरक्षा का अहसास दिया है। विकास भी हुआ है। एक्सप्रेसवे बनने के बाद से दिल्ली जाना आसान हो गया है। पहले घंटों मोदीनगर के जाम में ही फंस जाते थे।
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ब्रह्मपुरी में जूतों का कारोबार करने वाले कपिल शर्मा बताते हैं कि योगी सरकार में ही कारोबार के लिए 20 लाख  का लोन मिला। कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर हुई है। भगतवपुरा के सब्जी विक्रेता हृदयेश कुमार जाटव कहते हैं, कोरोना के समय काम धंधा नहीं रहा। रोजगार का संकट हुआ तो सरकार ने फ्री राशन की व्यवस्था कर बड़ा सहारा दिया। शाहपीर गेट निवासी डॉ. मुशीर कहते हैं कि बेरोजगारी और महंगाई बढ़ी है, लेकिन कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है। हालांकि, वह यह भी जोड़ते हैं कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। करीमनगर के फरहान एम्ब्रॉयडरी का काम करते हैं। वे कहते हैं, युवाओं के रोजगार का मुद्दा सुलझाने में सरकार नाकाम रही है। वहीं, सराफ विशाल शर्मा को लगता है कि सरकार ने सुरक्षा का अहसास दिया है।

आसपास की सीटों का समीकरण
शहर से सटी कैंट सीट से भाजपा ने लगातार चार बार के विधायक सत्यप्रकाश अग्रवाल की जगह पूर्व विधायक अमित अग्रवाल पर दांव लगाया है। पास की ही दूसरी सीट मेरठ दक्षिण में भाजपा ने वर्तमान विधायक सोमेंद्र तोमर को ही उतारा है।
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ये सूरमा हैं मैदान में...
सपा : रफीक अंसारी
शिक्षा : 8वीं तक
मजबूती : 33 साल का सियासी अनुभव, मुस्लिम वोट, विवादों से दूर, सहज सुलभ।
कमजोरी : क्षेत्र विकास से उपेक्षित,  आंतरिक गुटबाजी, मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकना चुनौती।

भाजपा : कमलदत्त शर्मा
शिक्षा : 7वीं तक
मजबूती : पहली बार मैदान में। युवाओं का साथ। टीम वर्क वाले नेता। ध्रुवीकरण कराने में माहिर।
कमजोरी : दबंग छवि, पार्टी में गुटबाजी। पुराने विवादों से जुड़े वीडियो हो रहे वायरल।

बसपा : दिलशाद शौकत
शिक्षा : 12वीं तक
मजबूती : पहली बार चुनाव का लाभ। वर्तमान विधायक के प्रति नाराजगी। पार्टी का बूथ मैनेजमेंट।
कमजोरी : दलित वोट बैंक कम है। मुस्लिम वोटों को बसपा के पक्ष में लाना चुनौती।

कांग्रेस : रंजन शर्मा
शिक्षा : साक्षर
मजबूती : निगम कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष हैं। ब्राह्मण समाज की कई संस्थाओं से जुड़े हैं।
कमजोरी : सियासत का अपेक्षाकृत कम  अनुभव, पहली बार चुनाव मैदान में।

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