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समझ आने लगा है बेजुबानों का दर्द

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मेरठ। पिंजरे में बंद जीव-जंतुओं का दर्द क्या होता है...ये अब लोगों को समझ आने लगा है। कोरोना के खौफ के कारण 21 दिन तक घरों में रहने के लिए मजबूर लोग दोस्तों से व्हाट्स एप, फेसबुक एवं अन्य सोशल मीडिया पर बनाए ग्रुपों के माध्यम से इस दर्द को साझा कर रहे हैं। वेे लिख रहे हैं कि घर में सबकुछ है परंतु खुलापन नहीं। इससे चहारदीवारी में बंद रखे जाने वाले जीवों की पीड़ा का अहसास हो रहा है। चिड़ियाघर में उन्हें खाने-पीने के साथ जंगल का वातावरण भी दिया जाता है परंतु खुले में विचरण नहीं कर सकता है।
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बरसों से लोगों ने ऐसे दिन नहीं देखे जब इस तरह से उन्हें घर में कैद होना पड़ेगा। हालांकि जिंदगी की सलामती के लिए हर किसी के लिए ऐसा करना मजबूरी है। आठ दिन से घरों में रहने के कारण लोग अब कुछ अलग भी सोच रहे हैं। शहर में जहां आजकल दिन में भी मोर और दूसरे पंछियों की आवाज सुनाई दे रही है। वहीं, उन्हें लेकर लोग व्हाट्स एप ग्रुप पर चर्चा कर रहे हैं। शास्त्रीनगर निवासी निमेष सिंह लिखते हैं कि दिन में ऐसी आवाजें कभी नहीं सुनने को मिली थीं परंतु अब पता चल रहा है कि हमारे बीच ये भी रहते हैं। लगता है कि यह सब ट्रैफिक के शोर में दबा हुआ था। रात को कुत्तों के अधिक भौंकने पर कोणार्क कॉलोनी निवासी राहुल लिखते हैं कि इन बेजुबानों के खाने का भी ध्यान रखें। शायद बहुत से ऐसे कुत्ते हैं जिन्हें रोजाना लोग रोटी खिलाते थे। अब ये भूखे हो सकते हैं। पंचवटी कॉलोनी निवासी सुशील शर्मा लिखते हैं कि न दिखने वाले वायरस के कहर के बारे में सोचा भी नहीं था। यदि हम अब भी नहीं सुधरे, प्रदूषण को लेकर जागरूक नहीं हुए तो एक दिन ऐसा वायरस पैदा होगा जो हवा के साथ हर किसी की सांस के जरिए अंदर पहुंचकर सबकुछ खत्म कर देगा। सफाई को लेकर भी लोग एक-दूसरे को जागरूक कर रहे हैं। सोशल ग्रुप में जुड़े मयंक गुप्ता लिखते हैं कि कोरोना आने के बाद हम सफाई को लेकर जागरूक हुए हैं। अब हमेशा के लिए ही जागरूक रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि कोरोना से निजात पाने के बाद हम फिर से पहले की तरह हाथ मिलाना शुरू कर दें। सोशल मीडिया ग्रुप पर एक-दूसरे से जुड़े लोग जीव-जंतुओं को लेेकर भी सीख दे रहे हैं।
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