उत्खनन के प्रति जिज्ञासा को लेकर आसपास के गांव के ग्रामीण भी यहां पहुंचने शुरू हो गए हैं। लाखा मंडल एकाएक आकर्षण का केंद्र बन गया है। जिस जगह लाखा मंडप और प्राचीन गुफा है, उससे कुछ ही दूरी के स्थान को उत्खनन के लिए चुना गया है। आसपास के गांव के ग्रामीण दिनभर बरनावा में जमा रहे।
क्या है लाखा मंडप के टीले का सच
लाखा मंडल को महाभारत सर्किट में शामिल किया। साल 2005-06 में बरनावा टीले पर विकास कार्य भी कराए, लेकिन इसे बरकरार नहीं रखा। बरनावा में जो टीला है, उसे लेकर भी लंबे समय से विवाद है।
टीले पर मौजूद गुंबज का अलग-अलग ऐतिहासिक महत्व बताकर अपना-अपना हक जताते हैं। इससे कुछ ही दूरी पर गुफा मौजूद है, इसके विषय में कहा जाता है कि इन गुफाओं से होकर ही पांडव यहां से सुरक्षित निकाले गए थे। टीला खंडहर में तब्दील हो गया है। हिंडन किनारे इस टीले और गुफा के निकट शुरू होने वाली खुदाई से क्या इतिहास की परतें खुलेंगी यह तो आने वाले समय में ही पता चल सकेगा। इतिहासकार डॉ. केके शर्मा कहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए खुदाई महत्वपूर्ण है।
संस्कृति के विषय में जानने का अवसर मिलेगा। उम्मीद है कि यहां पुरातन संस्कृति का पता चलेगा। इस क्षेत्र में जिस तरह चित्रित धूसर मृदभांड मिलते रहे हैं, उससे इस पूरे क्षेत्र में महाभारत कालीन संस्कृति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राज जैन कहते हैं कि बरनावा में उत्खनन को लेकर पिछले करीब 50 साल से प्रयास चल रहे हैं। अलग-अलग लोगों ने प्रयास किए, इसके बाद अब मंजूरी मिली है। इसका लाभ मिलेगा।
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