जानीखुर्द (मेरठ)। गुरुकुल प्रभात आश्रम टीकरी में सोमवार को वेद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ऋग्वेद में विविध विद्याएं रहा। संगोष्ठी में विभिन्न प्रदेशों के विद्वानों ने अपने शोध पढ़े। इसके साथ ही कई तरह की भ्रांतियों को दूर कराया।
वैदिक मंगलाचरण के साथ संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया। इसमें आए विद्वानों का स्वागत किया गया। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और वर्तमान में जयपुर के एपेक्स विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सोमदेव शतांशु ने गुरुकुल में वेद संगोष्ठी का इतिहास बताया। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुरेंद्र ने कहा कि वेद के व्याख्यान को ग्रन्थों के रूप में बताया। उन्होंने द्विविधो हि वेदोक्तधर्मः, प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः निवृत्तिलक्षणश्च का प्रतिपादन करते हुए इष्टं प्राप्स्यामः, अनिष्टं हास्यामः का प्रतिपादन किया।
उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष श्रीलालबहादुरशास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली के कुलपति ने कहा कि इस जगत में जो कुछ आध्यात्मिक है। वह सब विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से सृष्टि के अनेक सिद्धांत सामने आए। बुद्धदेव के अनुसार सातवलेकर की दैवत संहिता में संहिता पद उचित नहीं है। आश्रम के कुलाधिपति विवेकानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि विद्वान लेखनी के शूरवीर योद्धा हैं। प्रभात आश्रम का प्रयास है कि वेदों पर विस्तृत व्याख्यान से भ्रांतियों को दूर कराया जाए।
कुलाधिपति ने कहा कि हम सभी शक्ति संपन्न हों। कार्यक्रम में सभी विद्वानों ने अपने शोधपत्र देवभाषा संस्कृत में ही प्रस्तुत किए। संगोष्ठी में प्रोफेसर विद्यानंद जी ( उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद), प्रोफेसर रामानुज उपाध्याय (दिल्ली), प्रोफेसर योगेंद्र भानु राजस्थान, डॉक्टर सत्येकतु, डॉक्टर वेदव्रत, डॉक्टर रविप्रभा, डॉक्टर विनोद कुमार, डॉक्टर वेदवर्द्धन आदि विद्वान उपस्थित रहे। गुरुकुल के मंत्री प्रोफेसर वाचस्पति ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।