मेरठ में किठौर के जंगल में मादा तेंदुए के साथ दिख रहे दोनों तेंदुए उसके बच्चे हैं। ये जंगली के साथ ही घरेलू हो गए हैं। सेही और नील गाय के बच्चों के अलावा दूसरे जानवरों का शिकार नहीं कर रहे हैं। वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट का मानना है कि मादा तेंदुए ने इन दोनों को आसपास के जंगल में ही जन्म दिया है। इसके बाद से ये यहीं रह रहे हैं। अगर ये तेंदुए पिंजरे में फंसते हैं तो ठीक है, वरना वन विभाग की टीम को इनके खुद ही जाने का इंतजार करना होगा। इन पर कोई जबरदस्ती नहीं की जा सकती है।
पिंजरा लगाने के अलावा वन विभाग की टीम कुछ नहीं कर सकती है। जब तक तेंदुए हिंसक न हों या फिर उनकी जान को खतरा न हो तब तक इन पर ट्रैंकुलाइजर गन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटे वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट एवं पूर्व डीएफओ जीएस खुशारिया बताते हैं कि मादा तेंदुआ की उम्र छह साल और दोनों बच्चों की उम्र पौने दो साल के करीब है।
बकरी, कुत्ता और मुर्गा नहीं हुआ
जीएस खुशारिया बताते हैं कि अभी तक तेंदुओं ने सेही का ही शिकार किया है। पिंजरे में उनको फंसाने के लिए बकरी, कुत्ता, मुर्गा और कलेजी को भी रखा गया लेकिन, मादा तेंदुए ने इन्हें छुआ तक नहीं है। इससे जाहिर हो रहा है कि बच्चों का जन्म यहीं पर हुआ है। वे सिर्फ सेही और नील गाय के बच्चे का ही शिकार कर रहे हैं। अगर वे जंगल से यहां पर आए होते तो बकरी, कुत्ता और मुर्गे का शिकार जरूर करते। माना जा रहा है कि बच्चों के गर्भावस्था में होने के समय मादा तेंदुआ भटककर यहां आ गई। बच्चों के जन्म के बाद वो यहीं पर रहने लगी। वह बताते हैं कि आमतौर पर तेंदुआ आदमी से दूरी बनाकर रहता है। लेकिन ये इंसान को देखकर दूर नहीं जाते हैं। ये जंगली के साथ घरेलू हो गए हैं। दिन में सुबह से दोपहर तक ये आसपास मिट्टी के टीलों और सरसों के खेत में रहते हैं। शाम को साढ़े तीन बजे के करीब मादा तेंदुआ खेत से बाहर निकालकर आती है, शिकार मिलने पर भी वह बच्चों को भी बुला लेती है।
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