बच्चों को शिक्षित करने में सरकारी सिस्टम भले ही फेल साबित हो जाए, लेकिन शहर के युवाओं की पहल रंग ला रही है। शहर में इंजीनियरिंग के छात्रों ने मिलकर गरीब बच्चों के जीवन को ज्ञान से रोशन करने का बीड़ा उठाया है। उद्गम संस्था नामक प्रोजेक्ट के माध्यम से युवा जिले के 300 से अधिक ग्रामीण बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं। पिछले आठ महीने से प्रतिदिन गरीब बच्चों की नियमित कक्षाएं चल रही हैं, जिसका असर बच्चों पर दिखने लगा है।
उद्गम अभियान की शुरुआत एमआईईटी कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों ने की थी। इसमें पांच दोस्त शांतनु शर्मा साकेत, दीपांशु चौधरी परतापुर, आदित्य सिंह मीनाक्षीपुरम और दुर्गेश ठाकुर भी मीनाक्षीपुरम के रहने वाले हैं। ये सभी जॉब करते हैं। पांचवां साथी प्रशांत रक्षापुरम में रहते हैं, ये पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। अभी तक संस्था की ओर से पांच गांवों के 300 बच्चों क ो निशुल्क शिक्षा अभियान से जोड़ा गया है। एक अगस्त 2018 में छज्जूपुर गांव से इसकी शुरू की थी। मिशन की तरह इस अभियान को शुरू किया था। जो अब लगातार बढ़ता जा रहा है। छज्जूपुर, अंजोली, ढिमोली, ढिंढाला और सोरखा गांव में बच्चों को पढ़ाते हैं। प्रति रविवार नहीं बल्कि हर रोज युवाओं की यह टोली गांवों में जाकर बच्चों को शिक्षित करती है।
प्रोजेक्ट से जुड़ चुके 90 से अधिक युवा
पांच दोस्तों से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में 90 युवा जुड़ चुके हैं। संस्था में शामिल दीपांशु कहते हैं हमारा उद्देश्य शिक्षक और छात्र दोनों तैयार करना है। चूंकि कक्षाएं प्रतिदिन हों, इसलिए हम लोग गांवों के या उस इलाके के आसपास रहने वाले ऐसे युवाओं क ो भी खोजते हैं जो समाजसेवा या निशुल्क शिक्षा में रुचि रखते हैं। उन युवाओं को हम अपने प्रोजेक्ट से जोड़कर उन्हें शिक्षक के रूप में तैयार करते हैं। हर गांव में हमने इसी तरह कुछ युवाओं को तैयार किया है। जो अपनी पढ़ाई के साथ प्रतिदिन इन बच्चों को भी एक से दो घंटे पढ़ाते हैं।
आईआईटी दिल्ली के नींव प्रोजेक्ट से जोड़ा
शांतनु ने बताया कि हम लोगों ने अपने इस अभियान को आईआईटी दिल्ली के नींव प्रोजेक्ट से भी जोड़ा है। रविवार को युवाओं ने लालकुर्ती क ी मलिन बस्ती में भी पढ़ाई का काम शुरू किया। यहां 50 बच्चों का समूह बनाया गया है। एक पाठशाला का निर्माण किया गया है, जहां प्रतिदिन मलिन बस्ती के बच्चों को अक्षरज्ञान सिखाया जाएगा। प्रमुख बात यह संस्था के सभी सदस्य निशुल्क और निस्वार्थ भाव से काम करते हैं। हर तीन माह पर बच्चों के लिए बाल सभा का आयोजन किया जाता है। बच्चे सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी देते हैं। एक संस्था के सहयोग से 180 बच्चों को जूते भी दिलवाए गए हैं।
परिजनों को भी मनाया
आदित्य सिंह ने बताया कि ये सभी बच्चे गरीब और मलिन बस्ती के रहने वाले हैं। इनके माता-पिता बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। बकौल आदित्य बच्चों को पढ़ाने से पहले उनके माता-पिता को शिक्षा का महत्व बताया। उसके बाद उन्होंने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजा।