डेंगू से बचाव में नाकाम रहने वाले स्वास्थ्य विभाग का अब उपकेंद्रों के नियमित संचालन में फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है। डेंगू के गलत आंकड़े पेश करने पर हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद स्वास्थ्य उपकेंद्रों में टीकाकरण और अन्य सेवाओं को लेकर गलत रिपोर्ट दी जा रही हैं। क्योंकि जिले के सरकारी रिकॉर्ड में नियमित संचालित 320 स्वास्थ्य उपकेंद्रों में अधिकांश पर ताले लटके हैं तो कई की बिल्डिंग तक खंडहर हो चुकी है। जबकि यहां तैनात एएनएम और स्टाफ को सेटिंग के चलते फ्री में सैलरी दी जा रही है। जिम्मेदार अफसरों ने भी कभी इन उपकेंद्रों का भौतिक सत्यापन तक नहीं किया। शुक्रवार को अमर उजाला की पड़ताल में यह सच सामने आया।
सेटअप और जिम्मेदारी
सरकार ने प्रत्येक पांच हजार की आबादी पर एक उपकेंद्र खोला था। स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार जिले में वर्तमान में 320 स्वास्थ्य उपकेंद्र नियमित संचालित हैं। जहां एएनएम और जरूरी स्टाफ तैनात है। जिनकी बेसिक जिम्मेदारी गर्भवती माताओं के टीकाकरण के साथ ही प्रसव के बाद नवजात का टीकाकरण करना है। साथ ही संबंधित क्षेत्र में 50 साल आयु वर्ग के परिवारों का रजिस्टार तैयार कराने से लेकर क्षेत्र में फैलने वाली हर बीमारी की सूचना देते हुए चिकित्सा कैंप लगवाना है।
खुल गई पोल
1976-77 से पहले तक जिले में महज 24 उपकेंद्र थे। जो 2006 तक बढ़कर 320 हो गए थे। उसके बाद सरकार ने पीएचसी-सीएचसी खोलने पर ही फोकस रखा। लेकिन कभी इन उपकेंद्रों का भौतिक सत्यापन ही नहीं हुआ। पड़ताल में अधिकांश उपकेंद्र बंद मिले तो कई उपकेंद्रों के भवन तक खंडहर मिले। जबकि रिकॉर्ड में सभी को नियमित बताते हुए यहां टीकाकरण के साथ ही स्टाफ का वेतन भी जारी होना बताया गया। अगर यहां वास्तव में काम होता तो वायरल, डेंगू व चिकनगुनिया से हुई मौतों को रोका जा सकता था। क्योंकि स्वास्थ्य सेवाएं तो तभी मिलेंगी, जब उपकेंद्र खुला होगा।
जिम्मेदार तो ये भी हैं
सीएमओ ऑफिस में इस समय आठ एसीएमओ और 6 डिप्टी सीएमओ तैनात हैं, जिनके पास गाड़ी से लेकर तमाम सुविधाएं हैं। लेकिन कभी कोई फील्ड में यह देखने नहीं गया कि इन उपकेंद्रों की हालत क्या है। स्टाफ क्यों नहीं आ रहा। हैरत यह है कि न तो इन केंद्रों का भौतिक सत्यापन हुआ और कभी किसी पर कार्रवाई।
यह दिखा सच
केस 1: भावनपुर ब्लॉक के जई गांव स्थित उपकेंद्र पर बीते 10 साल से कोई स्टाफ ही नहीं गया। पूर्व प्रधान राजेश का कहना है कि हमने कभी यहां पर कोई स्वास्थ्य कर्मी नहीं देखा है। महिलाओं व बच्चों का टीकाकरण भी नहीं हुआ। बिल्डिंग बनने के 1-2 माह तक नियमित तौर पर खुले उपकेंद्र का वर्तमान हाल बता रही है कि यहां लंबे अर्से से कोई नहीं आया है।
केस 2: दौराल ब्लॉक के असौता व सिवाया गांव के उपकेंद्र पर दोपहर 2:30 बजे से तीन बजे के बीच ताला लगा मिला। किसी भी उपकेंद्र के सूचना पट पर यह भी दर्ज नहीं था कि संबंधित स्टाफ कहां गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार 20 -25 दिन में एएनएम आती है। लेकिन 1-2 घंटे बाद ही बंद करके चली जाती है।
केस 3 : कागजों में चल रहे परीक्षितगढ़ ब्लॉक स्थित खजूरी गांव के स्वास्थ्य केंद्र का हाल तो और भी चौंकाने वाला था। हेल्थ पोस्ट की खंडहरनुमा बिल्डिंग की ईंटें तक चोरी हो चुकी हैं। अब इस जगह पर गोबर पाथा जा रहा है। बस यहां कभी स्वास्थ्य उपकेंद्र था और यहां तैनात एएनएम को नियमित तौर पर भुगतान भी किया जा रहा है।
केस 4 : इंचौली के स्वास्थ्य उपकेंद्र पर दोपहर को ताला लटका मिला। परिसर में काफी गंदगी जमा थी तो सरकारी नल खराब पड़ा था। यह हाल बताने के लिए काफी थी कि यहां कितने लोगों को स्वास्थ्य सेवा दी जा रही होंगी।
केस 5 : दोपहर 2:10 बजे मसूरी के स्वास्थ्य उपकेंद्र पर भी ताला लगा मिला। यहां के लोगों ने उपकेंद्र नियमित न खुलने की शिकायत की।