जो व्यक्ति शस्त्र लाइसेंस बनवाने के बाद छह साल में भी रिवाल्वर नहीं खरीद पाया, उसे उसकी मौत के बाद ढाई माह की छूट दे दी गई। यह लापरवाही जिलाधिकारी कार्यालय के शस्त्र अनुभाग की है। बाबुओं की मेज से चली अनुमति की फाइल सिटी मजिस्ट्रेट की टेबल तक पहुंची और वहां से भी इसे ओके कर दिया गया। अब मामला खुला तो इसे उच्चाधिकारियों की नजर से छिपाने का प्रयास किया जा रहा है।
ये है पूरा मामला
मोहल्ला रविंद्रपुरी, गंज बाजार निवासी सुधीर कुमार पुत्र सुंदर लाल को जिलाधिकारी ने 16 अप्रैल 2009 को शस्त्र लाइसेंस जारी किया था। उनका लाइसेंस क्रमांक 1192 था। किन्हीं कारणों से वह रिवाल्वर नहीं खरीद सके और लगातार इसकी अवधि बढ़वाते रहे।
इस बीच, 26 अप्रैल 2015 को बीमारी के चलते सुधीर का निधन हो गया। नियमानुसार सुधीर का शस्त्र लाइसेंस निरस्त हो जाना चाहिए था, लेकिन फाइलों में यह छूट बराबर चलती रही। शस्त्र अनुभाग ने बगैर इसकी जांच किये 5 मई 2016 को सुधीर के लाइसेंस पर 21 जुलाई 2016 तक शस्त्र खरीदने की अवधि बढ़ाने के आदेश जारी कर दिए। खास बात यह रही कि अवधि बढ़ाने के इस आदेश पर लिपिकों ने सिटी मजिस्ट्रेट के भी हस्ताक्षर करा लिए।
नियम तो यह कहते हैं
शस्त्र लाइसेंस जारी होने के बाद एक साल के भीतर शस्त्र खरीदकर उसका निरीक्षण कराते हुए लाइसेंस पर दर्ज कराना होता है। किन्हीं कारणों से यदि लाइसेंस धारक शस्त्र नहीं खरीद पाता है तो उसे जायज कारण बताते हुए शस्त्र खरीदने की अवधि बढ़वाने के लिए आवेदन करना होता है। इसके आधार पर अवधि बढ़ा दी जाती है।
अवधि बढ़वाने के लिये रिवाल्वर की बुकिंग के बाद नंबर आने में होने वाली देरी, बीमारी जैसे कारण प्रमुख होते हैं। इसमें लाइसेंस धारक खुद आवेदन करता है। इस प्रक्रिया में कोई दूसरा आवेदन नहीं कर सकता।
उठ रहे सवाल
इस मामले में शस्त्र अनुभाग की लापरवाही तो प्रथम दृष्ट्या सामने आ ही रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर सुधीर की मौत के बाद उनके लाइसेंस पर शस्त्र खरीदने की अनुमति क्यों और किसने बढ़वाई। इससे साफ है कि शस्त्र अनुभाग की साठगांठ से कहीं न कहीं कोई बड़ा गोरखधंधा है।
पहला नहीं है मामला
शस्त्र लाइसेंस को लेकर इस तरह का घपला पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी कई मामले हो चुके हैं। एमडीए लिपिक लाल बहादुर दूबे के नाम शस्त्र लाइसेंस था। जिसकी शिकायत होने पर तीन साल पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी ने उसे निरस्त कर दिया था।
लेकिन, डीएम कार्यालय से इसकी सूचना संबंधित थाने को नहीं दी गयी और लाल बहादुर के लाइसेंस का शस्त्र अनुभाग ने थाने की रिपोर्ट पर नवीनीकरण कर दिया। इस मामले में मंडलायुक्त ने जब सभी को तलब किया तो वर्तमान सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा था कि यह उनके नहीं, बल्कि पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट के समय में हुआ है। अहम बात यह है कि इस मामले में अभी तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है।