जिलाधिकारी दीपक मीणा द्वारा स्टांप घोटाले की गंभीरता को देखते हुए शासन को जानकारी दी। स्टांप आयुक्त ने प्रदेश के सभी जनपदों में तीन-तीन साल के स्टांप की जांच कराने के निर्देश कर दिए। मेरठ में तीन साल में 997 फर्जी स्टांप से रजिस्ट्री होना पाया गया। इसमें सभी फर्जी स्टांप में कोषागार की मुहर व हस्ताक्षर मिले।
इस गिरोह ने राज्य सरकार को आर्थिक रूप से 7,3145000 रुपये की क्षति पहुंचाई है। जांच में सामने आया कि विशेष रूप दो या तीन विलेखों को छोड़कर उक्त संबंध विलेख एक ही अधिवक्ता द्वारा निष्पादित कर उपनिबंधक कार्यालय में पंजीकृत कराए गए है।
उपनिबंधक सदर व सरधना की जांच रिपोर्ट में 997 विलेख में वर्णित क्रेतागण मैसर्स पर्व एसोसिएट्स, मैसर्स वेद एसोसिएट्स और मैसर्स वासु एसोसिएट्स आदि के विरुद्ध सिविल लाइन में धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (अनैतिक तरीके से फर्जी दस्तावेज तैयार करना), 468 (जालसाजी करना), 471 (जाली दस्तावेज को असली बताकर प्रस्तुत करना) के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया गया है।
दिनभर मंथन, फिर कार्रवाई
जिलाधिकारी ने इस संबंध में मंगलवार को रजिस्ट्री कार्यालय के अधिकारियों से बातचीत की। पुलिस द्वारा कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। अभी तक जांच में 997 फर्जी स्टांप के मामले में भी पुलिस चुप्पी साध रही थी। जिस पर जिलाधिकारी ने एसएसपी को फोन करके इस मामले में कार्रवाई करने की बात कही और शासन को रिपोर्ट जाने का हवाला दिया। जिसके बाद सिविल लाइन थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है।
स्टांप घोटाला कर राजस्व को हानि पहुंचाने वालों के खिलाफ शासन स्तर से बड़ी कार्रवाई की तैयारी है। मेरठ के अलावा गाजियाबाद, सहारनपुर व मुजफ्फरनगर सहित कई जनपदों में गिरोह बनाकर फर्जी स्टांप से रजिस्ट्री कराने का खेल चल रहा है। आरोपी स्टांप विक्रेता के अलावा कोषागार की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कोषागार की मुहर व हस्ताक्षर के फर्जी स्टांप से रजिस्ट्री होती रही और अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी। स्टांप घोटाला की जांच करने वाले रजिस्ट्रार कहते हैं कि तीन साल ही नहीं, करीब 10 साल से यह खेल मेरठ में चल रहा था। दस प्रतिशत की छूट पर फर्जी स्टांप बेचा जा रहा था।
फर्जी स्टांप से रजिस्ट्री होने का खेल मेरठ सहित कई जनपदों में चल रहा था। पोल खुली और गोपनीय तरीके से जांच होने लगी। सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लगाया गया है। 18 जनवरी 2024 को अमर उजाला ने स्टांप घोटाले का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया। उसके बाद ही जिला प्रशासन गंभीर हुआ। जिलाधिकारी दीपक मीणा ने सभी रजिस्ट्रारों की बैठक ली और तीन साल के स्टांप की जांच कराने के निर्देश दिए थे। एक सप्ताह पहले कमिश्नर सेल्वा कुमारी जे. ने एसआईटी गठित कर दी। वहीं तीन स्टांप विक्रेता शुभम शर्मा, अजय कुमार और आकाश वशिष्ठ का लाइसेंस निलंबित कर दिया।
गाजियाबाद से शुरू हुआ घोटाला
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि स्टांप घोटाला गाजियाबाद से शुरू हुआ था। यह स्टांप गाजियाबाद से मेरठ आए, जिनको मेरठ के कोषागार की मुहर और हस्ताक्षर लगाकर रजिस्ट्री का खेल शुरू करा गया। रजिस्ट्री कार्यालय के अधिकारियों ने गाजियाबाद कोषागार के अधिकारियों से भी संपर्क किया था। हालांकि अभी तक गाजियाबाद के कोषागार या फिर स्टांप विक्रेता का नाम लिखा-पढ़ी में सामने नहीं आया है।
स्टांप घोटाले के मामले में मुकदमा दर्ज कराया है। इस प्रकरण में जो भी आरोपी होंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। फर्जी स्टांप से रजिस्ट्री करने वाले लोगों से राजस्व की वसूली भी कराई जा रही है। - दीपक मीणा, जिलाधिकारी