आठ साल की उम्र में की विग्रह स्थापना
राधानवरंगी लाल मंदिर में सेवा करने वाले नीरज गोस्वामी बताते हैं कि महाप्रभु हित हरिवंश जब आठ साल के थे, तब राधा रानी ने स्वप्न में बताया कि तुम्हारे घर के पीछे बगीचे में स्थित कुएं में विग्रह मिलेगा, उसे स्थापित कर यहां मंदिर बनाओ और उपासना करो। तभी कुएं से विग्रह मिलने पर उसकी स्थापना 1541 विक्रमी को हुई थी। वह कुआं आज भी है, जिस पर ठाकुर श्री राधानवरंगी लाल का प्राकट्य स्थल लिखा है। नीरज गोस्वामी ने बताया कि हित हरिवंश का विवाह 16 साल की आयु में रुकमणी से हुआ था। 32 साल की आयु में उन्हें पुन: स्वप्न आया, जिसके अनुसार चरथावल में धर्मपरायण ब्राह्मण आत्मदेव से मिलन और उनकी दो कन्याओं से विवाह उपरांत मिलने वाले विग्रहको वृंदावन ले जाकर स्थापित करना बताया गया है। महात्मा आत्मदेव ने जो विग्रह हरिवंश जी को भेंट किया था, वही विग्रह वृंदावन में स्थापित है।
जन्म के समय को लेकर भ्रम
देवबंद के मंदिर में हित हरिवंश के प्राकट्य का समय विक्रमी 1530 दर्ज है, जबकि वृंदावन के कुछ रसिक संत उनका प्राकट्य 1559 विक्रम संवत मानते हैं। नीरज गोस्वामी बताते हैं कि प्राचीन पुस्तकों से लेकर सभी जगह उनका प्राकट्य समय विक्रमी 1530 ही दर्ज है।
बसंत पंचमी और राधा अष्टमी पर जुटते हैं श्रद्धालु : राधावल्लभ संप्रदाय को मानने वाले श्रद्धालु हर साल वसंत पंचमी और राधा अष्टमी को राधानवरंगीलाल मंदिर में पहुंचते हैं। यूपी के अलावा दिल्ली, पंजाब, राजस्थान और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु आते हैं।
मंदिर की दीवारों पर लिखी हैं रसोपासना की पंक्तियां
हित हरिवंश ने राधा-कृष्ण की लीला के अनेक पदों की रचना की। ‘आज गोपाल रासरस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी। शरद विमल नभ चंद विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी। हित हरिवंश मगन मन स्यामा हरत मदन घन पीर री सजनी’। उनका मानना था कि राधा की उपासना और प्रसन्नता से ही कृष्ण भक्ति का आनंद प्राप्त होता है। हित हरिवंश की राधा-भाव उपासना पद्धति इतनी सिद्ध थी कि उन्हें तत्कालीन संत इस उपासना का आचार्य मानते थे। राधाजी में उनकी अनन्य आस्था थी। वह कहते थे - ‘रसना कटौ जु अन रटौ, निरखि अन फुटौ नैन। स्र्वन फूटौ ज अन सुनौ, बिन राधा जस बैन। उनकी भगवत भजन की रीति अद्भुत थी। वह श्रीराधा रानी के चरणों को हृदय में धारण कर श्रीकृष्ण की उपासना करते थे। इसलिए हित हरिवंश की उपासना को सखी भाव की उपासना माना गया है। वे कहते थे- ‘मैं अपने जन्म कर्मानुसार नरक में जाऊं या परमपद प्राप्त करूं, सर्वत्र मेरे हृदय में श्री राधा रति निकुंज मंडली ही सर्वदा विराजी रहे’।
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