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शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन बोले- इंसान की जान की अहमियत ज्यादा

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शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन बोले- इंसान की जान की अहमियत ज्यादा
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मेरठ। पूर्ण लॉकडाउन के बीच शनिवार को ईद उल अजहा (बकरीद) का त्योहार सादगी और भाईचारे के साथ मनाया गया। शाही ईदगाह सहित शहर की अन्य ईदगाहों को छोड़ सभी मस्जिदों में इमाम के साथ पांच लोगों ने नमाज अदा की। कोतवाली स्थित शाही जामा मस्जिद में शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन ने नमाज से पहले तकरीर की। जिसमें उन्होंने कहा कि अल्लाह की नजरों में भी इंसान की अहमियत ज्यादा थी, यही कारण है कि करीब साढ़े चार हजार साल से बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी दी जाती है।
तकरीर में शहरकाजी ने कहा कि इस्लाम में इंसानियत को बचाना सबसे ज्यादा अहम माना गया है। करीब साढ़े चार हजार साल पहले अल्लाह ने नबी इब्राहिम अल को आजमाने के लिए 10 वर्षीय बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने का हुक्म दिया। अल्लाह की रजा के लिए इब्राहिम अल अपने मासूम बेटे को कुर्बानी के लिए लेकर गए। जब वह अपने बेटे की गर्दन पर छुरी फेरने लगे तो अल्लाह ने वहां दुम्बा (बकरे जैसा जानवर) पेश कर दिया। शहरकाजी ने कहा कि इस्लाम में इंसानियत को बचाना सबसे पहला और बड़ा धर्म है।
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हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार रहें
बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी देकर पीछे नहीं हटना है। पूरे साल किसी न किसी रूप में कुर्बानी देना इस्लाम का अहम हिस्सा है। जरूरतमंद को अपने हिस्से का पैसा या अन्य सामान देना भी कुर्बानी है। कोरोना वायरस के दौर में लोगों ने बहुत सी कुर्बानी देकर जरूरतमंदों तक खाना और राशन पहुंचाया है, जो आगे भी जारी रहना चाहिए।
प्रशासन ने दिया साथ तो त्योहार की बनी बात
पुलिस और जिला प्रशासन की उलमाओं के साथ बैठक में लिए गए सकारात्मक निर्णयों से ईद उल अजहा का त्योहार शांति और सादगी से मनाया गया। शहरकाजी जैनुस साजिद्दीन ने पुलिस-प्रशासन की सराहना करते हुए कहा कि लॉकडाउन के बावजूद लोगों को आने-जाने में रोक टोक नहीं हुई। उन्होंने शनिवार को मुस्लिम क्षेत्र इस्लामाबाद, जाकिर कॉलोनी, किदवई नगर और मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों का दौरा किया। शहर में कुर्बानी खुले में नहीं की गई, बल्कि निजी स्थानों पर बंद स्थानों पर की गई। लोगों ने उलमाओं की अपील और प्रशासन के निर्देशों का पूरा पालन किया, जो काबिल ए तारीफ है।
शाही ईदगाह में टूटी 850 साल पुरानी परंपरा
मेरठ। शहर कारी शफीकुर्रहमान कासमी ने करीमनगर स्थित अपने आवास पर नमाज अदा की। उन्होंने कहा कि शाही ईदगाह में बकरीद की नमाज न होने से 850 साल पुरानी परंपरा टूट गई। जब मस्जिदों में पांच लोग नमाज अदा कर सकते हैं तो फिर खुले आसमान के नीचे नमाज पढ़ने और पढ़ाने में क्या परेशानी हो सकती थी। खुले में कोरोना का भी खतरा नहीं होता है। मस्जिदें वीरान न हों, इसलिए पांच समय की नमाज की इजाजत है। जबकि ईदगाहों में साल में दो बार ही नमाज अदा की जाती है। उलमाओं को ईदगाह में पांच लोगों के नमाज अदा करने की इजाजत पर विचार करना चाहिए था।
हलाल की कमाई खर्च करें
कारी शफीकुर्रहमान ने कहा बकरीद से हमें त्याग और बलिदान की सीख मिलती है। अल्लाह को पसंद है कि बंदा उसकी राह में हलाल तरीके से कमाया हुआ पैसा खर्च करे। कुर्बानी का सिलसिला ईद से लेकर तीन दिनों तक चलता है। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि दोनों दिनों में भी रियायत और नरमी बरती जाए। बकरीद के दिन कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक खुद के लिए, दूसरा सगे-संबंधियों के लिए और तीसरा गरीबों में बांटा जाता है। जिस पर सभी को अमल करना चाहिए।
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सोशल मीडिया पर चला बधाइयों का दौर
बकरीद पर लोगों ने एक-दूसरे के घरों पर जाकर दावत लेने से परहेज किया। अधिकतर लोगों ने सोशल मीडिया पर ही बकरीद की बधाई देकर त्योहार मनाया। मौलाना मशहूदुर रहमान जमाली ने बताया कि सड़कों पर लोग नजर नहीं आए। जबकि कुर्बानी में भी बहुत अहतियात बरती गई।
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