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शाहिद मंजूर नहीं बचा सके अपना ‘सैफई’

Sun, 12 Mar 2017 02:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 शाहिद मंजूर का गढ़ किठौर इस बार उनके हाथ से निकल गया। इसी गढ़ के दम पर शाहिद मंजूर ने प्रचार के दौरान पुलिसकर्मियों से झड़प के दौरान कह दिया था कि यह उनका सैफई है। हालांकि जिला पंचायत के चुनाव में भी बेटे को अध्यक्ष पद का टिकट न दिलाने पर भी मंत्री को झटका लगा था।
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शाहिद मंजूर ने किठौर से तीन बार विधानसभा पहुंचकर पश्चिम उप्र की राजनीति में अपना कद काफी बढ़ा लिया था। शाहिद के पिता मंजूर अहमद भी पश्चिम में मुस्लिमों के बड़े नेता के रूप में जाने जाते थे। मंजूर अहमद 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से किठौर सीट से चुनाव लड़े थे। दो साल में ही सरकार गिर गई थी। 1969 में वह फिर चुनाव मैदान में कूदे और जीतकर विधानसभा पहुंचे। सादगी पसंद मंजूर अहमद की मजबूती यह थी कि वह हिंदुओं का बड़ा वोट बैंक बटोरते थे। उन्हीं के नक्शे कदम पर शाहिद मंजूर चले। सपा के चुनाव चिन्ह पर 2002, 2007, 2012 में लगातार तीन बार विधायक बने। दो बार कैबिनेट मंत्री भी बने। इस बार अपने मजबूत वोट बैंकों पर उनकी पकड़ ढीली हो गई।
यह भी माना जा रहा है कि बेटे को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने की उनकी चाह ने भी इस चुनाव में उनका नुकसान किया। जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में उनके खिलाफ कई गुट बन गए थे। स्थानीय राजनीति भी इस कारण प्रभावित हुई। ब्लॉक प्रमुखी की राजनीति के कारण भी अलग-अलग गुट बन गए। यहां तक कहा जा रहा है कि कुछ जगहों पर मुस्लिम मतदाताओं ने ही उन्हें हराने के लिए भाजपा को वोट दिया। वहीं हिंदू मतदाताओं पर उनकी पकड़ मोदी लहर के कारण कमजोर हुई। उनके परिवार के कुछ सदस्यों के प्रति भी नाराजगी को एक कारण माना जा रहा है।
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