दलितों के इस विरोध प्रदर्शन में भी लोग सुबह सड़कों आए तो तिरंगे उनकेहाथों में थे। लगा कि यह विरोध भी शांति से उसी अंदाज में होगा जैसे अन्य दूसरे आंदोलन होते रहे हैं। हाथों में तिरंगा था पर दस बजते बजते माहौल ही बदल गया। तिरंगा हाथों में लेकर ही आगजनी शुरू कर दी गई। पुलिस चौकी, बसें, बाइकें फूंकते समय भी उपद्रवियों के हाथों में तिरंगा रहा। तोड़फोड़, बवाल, पथराव शुरू हो गया। यह भुला दिया गया है कि तिरंगे का एक मान है। एक हाथ में तिरंगा और दूसरे में पत्थर। बावजूद इसके यह सिलसिला चलता रहा। घंटों चले इस बवाल में तिरंगे का अपमान ही होता रहा।
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