मेरठ। यूपी एटीएस द्वारा पकड़े गए आतंकी साजिश के संदिग्धों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। मास्टरमाइंड साकिब उर्फ डेविल और उसका साथी अरबाब, जो मूल रूप से परीक्षितगढ़ के अगवानपुर निवासी हैं, ईद के मौके पर मेरठ आए थे। तीन दिनों तक वे अपने घर में रुके लेकिन स्थानीय इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) को इसकी कानों-कान भनक तक नहीं लगी। अब जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि इन तीन दिनों के भीतर उन्होंने मेरठ के मॉल, रेलवे स्टेशनों या अन्य भीड़भाड़ वाले इलाकों की रेकी कर फोटो या वीडियो पाकिस्तानी हैंडलरों को तो साझा नहीं किए।
एसएसपी अविनाश पांडेय के अनुसार साकिब उर्फ डेविल पिछले 8 सालों से हैदराबाद में रहकर नाई की दुकान चला रहा था जबकि अरबाब 4 साल पहले गुरुग्राम शिफ्ट हो गया था और वहां वेल्डिंग का काम करता था। ये दोनों लंबे समय से पाकिस्तानी हैंडलरों और कट्टरपंथी संगठनों के संपर्क में थे। पूछताछ में सामने आया है कि इनके निशाने पर वेस्ट यूपी के कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान, मॉल और रेलवे स्टेशन थे। ईद के दौरान जब ये घर से दोस्तों से मिलने के बहाने निकलते थे, तब इनके मूवमेंट की अब सीडीआर के जरिए गहन जांच की जा रही है।
साकिब 2019 में जा चुका है जेल
जांच में यह भी सामने आया कि मास्टरमाइंड साकिब का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है। वर्ष 2019 में परीक्षितगढ़ थाने में उसके खिलाफ एक किशोरी ने दुष्कर्म और पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। इस मामले में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी और साकिब जेल भी गया था। जमानत पर बाहर आने के बाद वह हैदराबाद चला गया था, लेकिन कोर्ट की तारीखों पर वह लगातार मेरठ आता रहता था। पुलिस अब कोर्ट से उसके मुकदमे के वर्तमान स्टेटस की जानकारी जुटा रही है।
इंटेलिजेंस खंगाल रही है परिजनों और मददगारों की कुंडली
एटीएस और मेरठ इंटेलिजेंस की टीमें अब गोपनीय रूप से इनके परिजनों और करीबियों की भूमिका की जांच कर रही हैं। यह भी देखा जा रहा है कि साकिब ने कचहरी आने-जाने के दौरान यहां अपना कोई नया नेटवर्क तो तैयार नहीं कर लिया था। साकिब और अरबाब के संपर्क में मेरठ के कौन-कौन से युवक थे इसकी सूची तैयार की जा रही है। आशंका जताई जा रही है कि ग्रेटर नोएडा, अंबाला, गाजियाबाद और हापुड़ से हाल ही में पकड़े गए जासूसों से मिले इनपुट के आधार पर ही एटीएस ने यह बड़ी कार्रवाई की है। फिलहाल एटीएस और लोकल पुलिस दोनों आरोपियों के मोबाइल डेटा और कॉल रिकॉर्ड्स के जरिए यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि साजिश की जड़ें कितनी गहरी हैं।