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Meerut News: बढ़ता तापमान, दहलन और गेहूं की चमक कर देगा फीखी

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मोदीपुरम। वेस्ट यूपी में समय से पहले मौसम का गर्म होना और लगातार तापमान में बढोतरी से किसान और वैज्ञानिक चिंतित हो रहे हैं। ऐसे हाल में गेहूं और दलहनी फसलों का बढ़ता हुआ तापमान चकम फीकी कर देगा। इसका असर उत्पादन पर भी साफ दिखेगा। सबसे ज्यादा गेहूं और दलहनी फसलों पर इसका असर दिखेगा।
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सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. आर एस सेंगर के अनुसार देश में पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग 12 लाख हेक्टेयर अधिक क्षेत्र में रबी की फसलों की बुवाई की गई है। इसमें दलहनी फसलों के रकबे में तीन लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा की वृद्धि हुई है। देश के साथ-साथ वेस्ट यूपी में इसकी बढोतरी हुई है। रबी की फसलों की बुवाई अक्तूबर से दिसंबर के बीच की जाती है। जनवरी-फरवरी के दौरान फसल तैयार होने का मौसम होता है। कटाई मार्च से अप्रैल के बीच की जाती है। रवि फसलों में प्रमुख रूप से गेहूं मसूर, चना, मटर, जौ, सरसों, आलू तिलहन अलसी आदि आती है लेकिन इस बार प्रारंभ से ही उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में रवि फसलों को शुष्क मौसम का सामना करना पड़ा है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है जो रबी की फसलों को क्षति पहुंचा सकता है। (संवाद)



उत्पादन कम होने की संभावना
मोदीपुरम। कृषि विवि के वैज्ञानिक डॉ. आरएस सेंगर फरवरी में लगभग 17 से 20 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है। जिससे पौधों में होने वाली मेटाबॉलिक एक्टिविटीज ठीक से हो पाती है तभी पौधों में उत्पादन अच्छा होता है लेकिन तापमान में अचानक हो रही वृद्धि के चलते पौधों की मेटाबॉलिक एक्टिविटीज प्रभावित हो रही है जिससे उत्पादन कम होने की संभावना नजर आ रही है।
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गर्मी बढ़ने से पतले हो जाएंगे दाने

मोदीपुरम। उत्तर भारत में इस बार फसलों पर दोहरी मार पड़ी है। पहले तो इस बार सर्दी के मौसम में होने वाली बारिश नहीं हुई। गर्मी समय से पहले पड़ने लगी है। सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि के प्रो. आरएस सेंगर का कहना है कि कच्ची फसल के दौरान अचानक बढ़े तापमान से न केवल गेहूं के दाने पतले होंगे। सामान्य फसल के 1000 गेहूं के दानों का वजन 38 से 45 ग्राम होता है, जबकि टर्मिनल हीट से प्रभावित फसल के 1000 दानों का वजन 28 से 30 ग्राम ही होता है। इस बार 11.21 करोड़ टन गेहूं की पैदावार होने की संभावना जताई है।



क्लाइमेट चेंज के कारण फसल पर पड़ने वाले प्रभाव को दृष्टिगत रखते हुए ऐसी प्रजातियों का विकास किए जाने पर जोर है, जो क्लाइमेट चेंज के कारण अधिक प्रभावित न हो और अच्छा उत्पादन दे सकें। कृषि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि वह ऐसी प्रजातियां विकसित करें जिससे भविष्य में किसानों को समस्या न हो वैज्ञानिकों को प्राथमिकता के आधार पर ऐसी परियोजनाओं पर कार्य करना होगा। - डॉ केके सिंह, कुलपति कृषि विवि
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