फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रिसर्च: किसानों को मिलेगी अच्छी फसल की बहार, कम सिंचाई में होगी आलू की बंपर पैदावार

Sun, 30 Dec 2018 12:28 PM IST
Dimple Sirohi मोहित कुमार, अमर उजाला, मेरठ
विज्ञापन
मेरठ न्यूज
विज्ञापन

जलवायु परिवर्तन का असर फसलों व उनके उत्पादन पर पड़ रहा है, जो कृषि वैज्ञानिकों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। इससे निपटने के लिए कम पानी में अधिक फसल उत्पादन लेने के लिए कई शोध  किए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि अब एक्वासोर्ब नाम का एक केमिकल सामने आया है, जो पानी की खपत को कम कर देता है और इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं है।

विज्ञापन


एक्वासोर्ब का आलू की फसल में इस्तेमाल कर उसके परिणाम जानने के लिए मेरठ के सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मोदीपुरम और फ्रांस की कंपनी एसएनएफ  प्राइवेट लिमिटेड द्वारा इस पर संयुक्त रूप से शोध किया जा रहा है। वैज्ञानिकों की मानें तो शुरूआती परिणाम काफी संतोषजनक रहे हैं। इसके प्रयोग से पानी की खपत कम हुई है और उत्पादन भी बढ़ा है।

कृषि विवि के बायोटेक विभाग में यह शोध किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि एक्वासोर्ब मृदा में उपस्थित जल और सूक्ष्म पोषक तत्वों को अवशोषित कर पौधों को निरंतर उपलब्ध कराता है। साथ ही मृदा की जल धारण क्षमता व बीज की अंकुरण क्षमता भी बढ़ाता है। एक्वासोर्ब के प्रयोग से सिंचाई में 50 प्रतिशत तक की बचत होती है।

इसके अलावा उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि होने का दावा किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मिट्टी में नमी अधिक समय तक बनी रहने के कारण पौधे की जड़ों का अच्छा विकास होता है। इसके अलावा एक्वासोर्ब कीटनाशकों व उर्वरकों को भूमिगत जल में पाए जाने तथा मृदा में होने वाले रिसाव से रोकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यदि यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा तो आने वाले दिनों में वेस्ट यूपी ही नहीं देशभर के किसानों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं होगा।

एक्वासोर्ब उच्च क्षमता का जल अवशोषक 
एक्वासोर्ब एक सुपर अवशोषी ऐनायिक पालीएक्रिलामाइड पॉलीमर है। यह पानी में अघुलनशील है और उच्च क्षमता का जल अवशोषक है। एक्वासोर्ब जल उपयोग क्षमता को बढ़ाकर मिट्टी में लंबे समय तक उपस्थित रहता है। यह मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाता है। एक्वासोर्ब जल को अपने भार के 400 गुना तक अवशोषित करने और धीरे-धीरे पौधों को उपलब्ध कराने में सक्षम है।
विज्ञापन

अन्य फसलों में किया जा सकता है प्रयोग
बायोटेक विभाग के एचओडी डॉ. आरएस सेंगर का कहना है कि इसका प्रयोग अन्य फसलों में भी किया जा सकता है। नर्सरी में प्रयोग से पहले क्यारियां बनाते हैं, उसके बाद एक्वासोर्ब की 150-200 ग्राम मात्रा प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र के हिसाब से बिखेरकर मिट्टी में 2-3 इंच गहराई में मिला देते हैं।

इसके बाद बीज बोकर फव्वारे से पानी लगा देते हैं। सीधी बोई जाने वाली फसलों जैसे गेहूं, चना, जौ, बाजरा, भिंडी, मक्का आदि में खेत तैयार करते समय 4-5 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से अंतिम जुताई द्वारा 6-12 इंच गहराई में मिलाकर खेत को समतल कर बीज बो देते हैं। पपीता, अनार, नींबू, संतरा, कटहल, आंवला आदि व नीम, शीशम, कदम आदि वन्य पौधों में रोपाई के समय प्रयोग किया जाता है।

बेहतर परिणाम आ रहे
कृषि विवि द्वारा एसएनएफ  के साथ अनुबंध में एक्वासोर्ब का प्रयोग आलू की फसल पर किया जा रहा है। फ्रांस की टीम के साथ शोध हो रहा है। बेहतर परिणाम आ रहे हैं।  -डॉ. आरएस सेंगर, एचओडी बायोटेक व शोधकर्ता विवि

भविष्य की चुनौती से निपटेंगे
जलवायु परिवर्तन की भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए हमें ऐसी प्रजातियों एवं तकनीकों का विकास करना होगा जो कि इको फ्रेंडली हों। एक्वासोर्ब के आलू की फसल में अभी तक शोध परिणाम सकारात्मक हैं। -डॉ. गया प्रसाद, कुलपति कृषि विवि

शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें

https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें