मेरठ। दिल्ली की मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी के वक्त महसूस हुआ कि शुद्धता के जिंदगी में क्या मायने हैं। असलीपन का असल स्वाद उन 730 दिनों में ही समझ आया। क्योंकि गांव में रहते हुए कभी सोचा ही नहीं कि शुद्ध, अशुद्ध भी कुछ होता है। दूध, दही, रोटी और पानी ही नहीं बल्कि सांस लेने वाली हवा भी अशुद्ध हो सकती है। ये उन दो सालों की नौकरी ने समझा दिया। बस समझ आ गया कि लंबा और निरोगी जीवन जीना है तो गांव लौटना होगा। फिर क्या एक दिन नौकरी छोड़ी और गांव लौट आया। मन बना लिया कि मिलावटी माहौल में कुछ ऐसा देना है जिसकी शुद्धता पर लोग गर्व करें। इसी सोच ने गाय के अस्पर्श दूध और जैविक खेती के काम को शुरू करने की हिम्मत दी। 20 एकड़ के पुश्तैनी गन्ने के खेत में डेयरी और जैविक खेत बना डाला। आज 100 से अधिक लोगों तक रोजाना गाय का बिना छुआ (अस्पर्श) दूध पहुंचाते हैं। जैविक विधि से गेहूं, बासमती, उड़द से लेकर मैथी, पालक, मूली, शलजम भी उगाते हैं।
हम बात कर रहे हैं रोहटा ब्लॉक के अरनावली गांव निवासी मनीष भारती की जो गणतंत्र के सच्चे प्रहरी हैं। जिन्होंने प्रकृति के मूलरूप को संरक्षित करने की एक छोटी पहल की है। मनीष ने 20 एकड़ के पुश्तैनी खेत जिसमें उन्होंने हमेशा गन्ना देखा उसे सब्जियों, फलों और अनाज के जैविक खेत में बदल दिया। खेत में एक ओर देसी नस्ल की उम्दा गायों की डेयरी बनाई। खेत में उगा प्रोटीनयुक्त प्राकृतिक चारा खिलाकर गायों को अच्छा आहार दिया। शुद्ध आहार से बने दूध को जापान की उन्नत मशीनों की मदद से बिना छुए ही लोगों तक पहुंचाना प्रारंभ किया। शहर में चिकित्सकों, कारोबारियों, उद्यमियों की एक बड़ी शृंखला आज मनीष के खेत में उगी सब्जियों, फल और अनाज की ग्राहक है। गाय के थन से सीधे पैकेट में पैक हो रहे दूध की प्रतिदिन 200 लीटर की सप्लाई है। अपने उत्पाद मनीष मेरठ सहित आसपास के शहरों में भेजते हैं।
मनीष कहते हैं कि स्मॉग, प्रदूषण, कीटनाशक के दौर में जहां लोग कैंसर, टीबी जैसी जानलेवा बीमारियों की चपेट में हैं। ऐसे में हमारी भी ड्यूटी बनती है कि हम थोड़ा मुनाफा छोड़कर कुछ अच्छा करें। कीटनाशक के इस्तेमाल से मैं पैसा कमा सकता हूं, लेकिन प्योरिटी प्रोडक्ट का सुकून जैविक खेती से मिला है। आज मनीष के साथ आठ से दस किसान जुड़ चुके हैं। जिन्होंने जैविक खेती को अपनाया है। बकौल मनीष जैविक खेती अधिक लागत वाली महंगी विधि है। फिर किसान को सरकार से बाजार और ग्राहक क ी सुविधा नहीं मिलती। बुनियादी सहारा नहीं मिलतो। अंतत: किसान का हौसला टूटता है। इसलिए अधिकांश कृषक चाहकर भी शुद्धता के इस तरीके से जी चुराने लगते हैं। सरकारें जैविक खेती के नारे के साथ किसानों को अच्छा बाजार उपलब्ध कराएं तो मिलावट पर काफी हद तक नियंत्रण संभव है। भोजन की विषाक्तता पर कुछ अंकुश लग सकता है।