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जहरीली शराब:  बिना जांच निपट जाते हैं मामले, आबकारी विभाग हर मौत को बताता है संदिग्ध, नहीं होती रिपोर्ट दर्ज 

Sun, 13 Sep 2020 01:14 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

  • मीरपुर जखेड़ा गांव में शराब से तीन मौतों का मामला 
  • गांव में 10 साल से चल रहा है अवैध शराब बिक्री का काम 
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जहरीली शराब मौत मामला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मेरठ में अवैध शराब से मीरपुर जखेड़ा गांव में हुई तीन लोगों की मौत के बाद भी सरकारी मशीनरी शराब से मौत होना नहीं मान रही है। सवाल यह है कि हर बार शराब से मौतें होती हैं, लेकिन जांच तो दूर की बात, तहरीर के आधार पर रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती है। उससे पहले ही पुलिस और आबकारी विभाग मौतों का कारण संदिग्ध बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
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पिछले 50 दिन में जिले में शराब से मौत होने का दूसरा मामला सामने आया है, जिसमें तीन लोगों की जान चली गई। मीरपुर जखेड़ा गांव में हाहाकार मच गया, लेकिन आबकारी विभाग अपने कारनामों पर पर्दा डालने में लगा है। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश से आने वाली अवैध शराब पुलिस व आबकारी विभाग की नाक के नीचे जिले में सप्लाई होती है। लेकिन न थाना पुलिस जागती है और न आबकारी विभाग।

20 जुलाई को डूंगर गांव में शराब पीने से तीन लोगों की जान चली गई थी और छह लोग गंभीर रूप से बीमार हुए थे। उसके बाद मामला शासन तक पहुंचा, लेकिन आबकारी विभाग को इसकी परवाह नहीं। विसरा जांच के लिए भेजने की बात कहकर पुलिस ने भी पल्ला झाड़ लिया। जबकि ग्रामीणों ने धरना प्रदर्शन तक किया और आबकारी विभाग की लापरवाही से मौत होने का आरोप लगाया था।
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अब 10 सितंबर को जानी क्षेत्र के मीरपुर जखेड़ा गांव में पवन, जगपाल और अमित की मौत जहरीली शराब पीने से हुई। गांव में लोग यही कहते रहे कि आबकारी विभाग और पुलिस की मिलीभगत से पिछले 10 सालों से यहां अवैध शराब का काम चल रहा है।

कई शराब माफिया हैं, जिनसे सरकारी मशीनरी की साठगांठ है। जब भी जिले में अवैध शराब या शराब से मौत होती है तो आबकारी विभाग मौत का कारण संदिग्ध बताकर पल्ला झाड़ लेता है। आखिर सवाल यह है कि जांच पर जांच चलती रहेंगी और शराब लोगों की जान लेती रहेगी।   

तहरीर पर रिपोर्ट तक दर्ज नहीं
मीरपुर जखेड़ा गांव में जहरीली शराब से पवन, जगपाल, अमित की तो मौत हो गई। परिवार के लोगों का कहना है कि गांव में शराब कहां से आई पुलिस और आबकारी विभाग को भी पता है। लेकिन दबाव बनाया जाता है कि शराब से मौत नहीं हुई। जो तहरीर दी गई उस पर रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की गई। लोगों ने कहा कि गांव में अवैध शराब की बिक्री होती है। गांव में जगह-जगह खाली पव्वों के ढेर लगे थे, जो इस बात की गवाही दे रहे थे।

शराब माफिया के प्रति पुलिस हमेशा से दिखी ‘रहमदिल’
जनपद में शराब माफिया के प्रति पुलिस हमेशा ‘रहमदिली’ दिखाती है। सरकार ने इन पर नकेल कसने के लिए मजबूत कानून भी बनाया है, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते पुलिस के शिकंजे में फंसने के बावजूद शराब माफिया आसानी से बच जाते हैं।

मीरपुर जखेड़ा में भी कुछ ऐसे ही हालात दिख रहे हैं। यहां तीन मौत शराब से हुई हैं, लेकिन पुलिस मानने को तैयार नहीं। 2018 में योगी सरकार ने अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए कड़ा कानून तैयार किया। शराब पीने से होने वाली मौत की घटनाओं में आबकारी एक्ट की धारा 60 (क) के तहत मुकदमा दर्ज करने का नियम बनाया। इसमें शराब तस्करी कर रहे लोगों को उम्रकैद ही नहीं, बल्कि मृत्युदंड का भी प्रावधान है। 
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विसरा रिपोर्ट के पीछे चल रहा खेल 
एक्सपर्ट की मानें तो शराब में जहर था अथवा नहीं, इसकी पुष्टि पोस्टमार्टम में कभी नहीं होती। विसरा जांच कराई जाती है। भ्रष्टाचार में डूबी पुलिस और आबकारी विभाग इसी को आधार बनाकर खेल खेलते हैं और आरोपियों को सजा दिलाने के बजाय बचाने की मुहिम में जुट जाते हैं। मुकदमा दर्ज किया भी जाता है तो वह धारा प्रयोग नहीं होती, जिससे आरोपी आसानी से छूट जाते हैं।  

खुद को बचाने के लिए अनदेखी
सरकार का मत है कि अगर शराब से मौत होती है तो इसके लिए न केवल आबकारी विभाग के अफसर, बल्कि पुलिस और प्रशासन के आला अफसर भी जिम्मेदार माने जाएंगे। वह कार्रवाई की जद में होंगे। शायद यही वजह है कि प्रशासन ऐसे मामलों में गंभीरता नहीं दिखाता।  

जांच की जा रही है 
 पूरे प्रकरण की जांच कर रहा हूं। सीओ सरधना भी इस मामले में जांच कर रहे हैं। जांच से पहले कुछ नहीं बताया जा सकता। - आलोक कुमार, जिला आबकारी अधिकारी
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