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Paris Olympics 2024: पेरिस में चलेगा अन्नू रानी का जादू, जेवलिन में भाग लेने वाली होंगी पहली भारतीय महिला

Tue, 30 Jul 2024 12:33 PM IST
Dimple Sirohi ऋषि कुमार, अमर उजाला, मेरठ

सार

अन्नू रानी मेरठ के सरधना रोड स्थित बहादुर गांव की रहने वाली हैं। पिता ने प्रैक्टिस करने से रोका तो उन्होंने गन्ने के खतों के बीच से गुजर रही चकरोड पर गन्ने का भाला बनाकर उसे फेंकना शुरू किया था। आज वह पेरिस ओलंपिक में जेवलिन स्पर्धा में भाग लेने वाली पहली भारतीय महिला होंगी।
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अन्नू रानी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अन्नू रानी को आज पूरा विश्व जानता है। वह जेवलिन थ्रो में ओलंपिक में भाग लेने वाली एक मात्र भारतीय महिला एथलीट हैं। मेरठ के बहादुरपुर गांव निवासी अन्नू रानी से पेरिस ओलंपिक में सभी को पदक की उम्मीद हैं। वह भाला फेंक स्पर्धा में प्रतिभाग करेंगी। नीरज चौपड़ा की अगुवाई में वह ओलंपिक में प्रतिभाग करने पहुंच चुकी हैं। अन्नू रानी एशियन गेम्स 2023 में स्वर्ण पदक जीतकर चर्चा में आई थी इसके बाद से देश के अन्य एथलीट भी उनसे प्रेरणा लेकर खेलों की ओर रुख कर रहे हैं।

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अन्नू रानी सरधना रोड स्थित बहादुर गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने गन्ने के खतों के बीच से गुजर रही चकरौड़ पर गन्ने का भाला बनाकर उसे फेंकना शुरू किया था। इसके बाद उनके भाई उपेंद्र ने उनकी ताकत को पहचाना और भाला फेंक के लिए उन्हें प्रेरित किया। इसके बाद से ही वह आगे बढ़ती चली गईं।

हालांकि उनके पिता अमर पाल सिंह ने इसका विरोध किया, लेकिन उन्होंने बमुश्किल पिता को मनाया और आगे बढ़ीं। कई बार चोरी छिपे भी अभ्यास किया और उनकी मेहनत रंग लाई। भाई ने उनका साथ दिया और आज वह इस मुकाम पर पहुंची हैं कि ओलंपिक में देश का नाम रोशन करने पहुंच चुकी हैं। अब सभी को उनके ओलंपिक में पदक की उम्मीद है।
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अन्नू रानी के इस मुकाम में पहुंचने तक उनके अलावा उनके परिवार का संघर्ष भी कम नहीं था। अन्नू रानी का जन्म बहादुरपुर गांव में 28 अगस्त 1992 को एक किसान परिवार में हुआ था। शुरूआत में उनके भाई उपेंद्र ने उनकी ताकत को पहचाना और उन्हें इस खेल में जाने के लिए प्रेरित किया।

गांव के माहौल के कारण उनका खेल में जाना कुछ लोगों को खटकता भी था, उनके खुद के पिता अमर पाल सिंह ने उन्हें पहले खेलने की इजाजत नहीं थी। उन्होंने चोरी छिपे प्रयास किया और बाद में अपने पिता को भी बनाया। भाई का इसमें विशेष सहयोग रहा। आर्थिक तंगी के कारण अपने पहले जूते भी उन्हें चंदे के रूप में मिले।

अमर उजाला पर देखें अन्नू रानी के संघर्ष की कहानी:

अन्नू रानी - फोटो : एएनआई
लगभग 15 वर्ष पूर्व उन्होंने खेलना शुरू किया था। गांव की पगडंडियों पर खेलते और गन्ने को भाला बनाकर प्रैक्टिस करने वाली अन्नू एक दिन देश-विदेश में होने वाली प्रतिस्पर्धाओं में देश का प्रतिनिधित्व करेंगी, यह शायद ही किसी ने सोचा होगा, लेकिन अपने संघर्ष और कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने ये कर दिखाया। अन्नू रानी तीन बहन व दो भाइयों में सबसे छोटी हैं।

उनके सबसे बड़े भाई उपेंद्र कुमार भी 5,000 मीटर के धावक थे और विश्वविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी ले चुके हैं। बड़े भाई के साथ अन्नू रानी ने भी खेल में रुचि दिखाई और सुबह चार बजे उठकर गांव में ही रास्तों पर दौड़ने जाया करतीं। बचपन में परिवार के साथ खेले जा रहे क्रिकेट मैच में जब काफी दूर से उन्होंने बॉल को आसानी से फेंका तो उनके भाई ने उनकी बाजुओं की ताक़त को पहचाना। उन्होंने एक गन्ने को भाले की शक्ल देते हुए उसे अन्नू के हाथों में पकड़ा दिया।

स्वामी विवेकानंद का रहा विशेष योगदान, वहीं से मिले पहले जूते
अन्नू की खेल में रुचि बढ़ी, तो भाई उपेंद्र कुमार ने उन्हें गुरुकुल प्रभात आश्रम का रास्ता दिखाया। घर से करीब 20 किलोमीटर दूर होने के कारण अन्नू जेवलिन थ्रो का अभ्यास करने के लिए सप्ताह में तीन दिन गुरुकुल प्रभात आश्रम के मैदान में जाती थीं। अन्नू के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि दो खिलाड़ियों पर होने वाले खर्चे को वहन कर सकें, इसे देखकर भाई उपेंद्र ने त्याग किया और बहन को आगे बढ़ाने में जुट गए।

उपेंद्र ने बताया कि अन्नू के पास जूते नहीं थे। आश्रम के गुरुजी स्वामी विवेकानंद ने लोगों ने अन्नू को आगे बढ़ाने के लिए कहा। वहां से आए चंदे से इकट्ठा की गई रकम से उसके लिए जूते खरीदे गए। अन्नू ने अपना अभ्यास जारी रखा और जेवलिन थ्रो में बेहतरीन प्रदर्शन किया। अपने ही रिकॉर्ड तोड़कर वह नेशनल चैंपियन बन गईं। इसके बाद अन्नू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने खुद ही 9 बार नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा। शुरुआती दिनों में उन्होंने कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम में प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने पूर्व भारतीय खिलाड़ी काशीनाथ नाइक से प्रशिक्षण लिया। अब साईं की ओर से उन्हें विदेशी कोच के द्वारा तैयारी कराई जाती है।

अन्नू रानी - फोटो : अमर उजाला
मां मुन्नी देवी रखती थी खाने का ध्यान
एक खिलाड़ी के लिए उसका खाना बहुत महत्व रखता है। शुरुआती दिनों से ही अन्नू रानी की मां मुन्नी देवी उनके खाने का विशेष ध्यान रखती थीं। बेटी सुबह अभ्यास के लिए जाती थी तो मां उसके लिए दूध और बादाम आदि को तैयार रखती थी। उसके बाद अन्नू को क्या खाना है उसकी तैयारी मां ही करती थी। बेटी को आज इस मुकाम पर पहुंचाने के लिए उनकी मां ने भी त्याग किया। कई बार पति अमरपाल सिंह से भी बेटी को लेकर उनकी नोकझोंक हुई। आज बेटी देश के लिए खेल रही है तो मां भी गर्व से फूली नहीं समा रही हैं। उन्होंने कहा कि अन्नू जब भी घर आती है तो खुद ही सारा काम भी करती है।

अन्नू पदक लेकर आएंगी
अन्नू रानी के भाई उपेंद्र बताते हैं कि अन्नू ने यहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है। आज पूरे परिवार को उनसे उम्मीद है कि वह पेरिस ओलंपिक में पदक लेकर आएंगी। स्वामी जा का आशीर्वाद उसके साथ है। 

बेटी के प्यार में भर आईं मां की आंखें
अन्नू रानी की मां मुन्नी देवी ने कहा कि 2023 एशियन गेम्स के बाद से बेटी घर नहीं लौटी है। देश को पदक दिलाने के लिए कभी किसी देश तो कभी किसी देश में खेल रही है। उम्मीद है कि वह पदक लेकर ही आएगी। यह कहते हुए उनकी आंखे भी नम हो गईं। अन्नू के पिता भी बेटी से अब पदक की उम्मीद जगाए हैं और वह स्वामी विवेकानंद के आश्रम में दिनभर समय गुजारते हैं और बेटी के लिए मन्नत करते हैं।
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अन्नू की मां - फोटो : अमर उजाला
अन्नू की उपलब्धियां:
व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ पदर्शन- 2022 में जमशेदपुर में होने वाली इंडियन ओपन जेवलिन थ्रो में 63.82 मीटर दूरी तय की
2023- एशियन गेम्स में 62.92 मीटर दूरी तय कर स्वर्ण पदक जीता
2021 - टोक्यो ओलंपिक में प्रतिभाग।
2022- बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक
2019 - वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय महिला का रिकॉर्ड।
2019 - एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक।
2017 - एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक।
2016 - साउथ एशियन गेम्स में रजत पदक।
2014 - एशियन गेम्स में कांस्य पदक।
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