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उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा की ये कहानी आपके दिल को छू जाएगी

Tue, 21 Feb 2017 08:40 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
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वेदप्रकाश
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वर्ष-1973 की बात है। होली के बाद का समय था। शाम के करीब साढ़े चार या पांच बजे होंगे। ब्रह्मपुरी में फूल मंडी के पास कंचन-माधुरी पॉकेट बुक्स के सामने 17-18 वर्ष का एक युवक (वेद प्रकाश शर्मा) साइकिल से पहुंचता है। शर्ट और पजामा पहने हुए उस युवक की साइकिल जर्जर अवस्था में थी। एक दीवार के सहारे साइकिल खड़ी कर वह प्रकाशन केंद्र में आया, जहां उसकी मुलाकात मुझसे (सुरेश जैन रितुराज) हुई। उसने मुझसे उपन्यासकार परशुराम शर्मा के घर का पता पूछा। एक बार तो मैं चुप्पी साध गया। फिर उसने मुझसे कहा, वैसे तो मैं पढ़ाई कर रहा हूं। एक उपन्यास लिखा है, जिसे छपवाना चाहता हूं। यह सुनकर मैं आश्चर्य में था। अगले ही पल सवाल कर बैठा- इतनी सी उम्र में उपन्यास लिख दिया। जवाब हां में मिला। नाम-पता पूछने पर उस युवक ने बताया कि मेरा नाम वेद प्रकाश शर्मा है।
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यह सुनकर वेद ने साइकिल संभाली और यह कहते हुए आगे बढ़ गए

उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा
कोतवाली के पास स्वामीपाड़ा में रहता हूं। इसके बाद मैंने वेद प्रकाश को परशुराम शर्मा का पता बता दिया। साथ ही कहा कि तुमने जो उपन्यास लिखा है, उनसे पहले मुझे दिखा देना। दरअसल, मुझे भी इस बात में दिलचस्पी थी कि इतनी सी उम्र में उसने कैसा उपन्यास लिखा है। उसकी शैली कैसी है। विषय क्या है। फिलहाल, यह सुनकर वेद ने साइकिल संभाली और यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि भैया मैं आपको लाकर दिखा दूंगा। अगले दिन दोपहर के समय वेद फिर साइकिल से मेरे प्रकाशन पर पहुंचे। हल्के पीले रंग के रजिस्टर में लिखा उपन्यास मुझे दे दिया। मैंने जल्दी-जल्दी रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए अंत तक नजर दौड़ा ली और उसे रख लिया। वेद से मैंने कहा कि अच्छा है। इसे हम छाप देंगे। तभी वेद ने मुझसे कहा कि एक शर्त रहेगी। मैंने पूछा क्या तो वह बोले- मैं डुप्लीकेट नाम से नहीं छपवाना चाहता। नाम मेरा ही रहेगा। मैंने उनकी बात मानते हुए कहा कि हम कम से कम दो हजार कॉपी प्रकाशित करेंगे। इस पर वह राजी हो गए। उस समय एक उपन्यास की कॉपी का मूल्य भी कम था। आग के बेटे शीर्षक से प्रकाशित इस उपन्यास को वेद प्रकाश ने जासूसी पर लिखा था। यहीं से उनकी और मेरी  दोस्ती शुरू हो गई। उस समय मेरी उम्र भी 22 से 23 वर्ष के बीच रही होगी। कुछ समय बाद ही वेद प्रकाश अपने उपन्यासों के जरिये पाठकों के दिलों पर राज करने लगे। उनका बड़ा नाम हो गया। मैंने अपने प्रकाशन केंद्र से उनके करीब 90 उपन्यास प्रकाशित किए।

( उपन्यासकार और प्रकाशक सुरेश जैन रितुराज से मनु चौधरी की बातचीत पर आधारित)
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