शहर को रोशन करने का दावा करने वाले नगर निगम में अंधेर राज कायम है। एलईडी लाइटें लगाने के लिए खंभों से जो ठीकठाक सोडियम लाइटें उतारी गईं, उनमें से करीब 10 करोड़ की लाइटों का अधिकांश सामान इधर-उधर कर दिया गया तो ज्यादातर लाइटों को चकनाचूर कर कबाड़ मान लिया गया। यही नहीं, स्क्रैप बेचने के लिए कमेटी भी गठित कर दी गई।
महानगर में नगर निगम, एमडीए, आवास विकास और डूडा ने पिछले कई वर्षों में करोड़ों रुपये की लाइटें लगवायी थीं। जिनके रखरखाव की जिम्मेदारी नगर निगम के पास रही है। हालांकि पिछले बीस साल में लाइटों पर खर्च किए गए 50 करोड़ से भी अधिक रकम में कई बार भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। पांच माह पहले शहर में गिनती करायी गयी तो लगभग 40 हजार सोडियम लाइटें गिनती में आयीं। अब इन लाइटों को उतारकर जहां नगर निगम में जमा किया जा रहा है, तो इनके स्थान पर एलईडी लाइटें लगायी जा रही हैं।
23 हजार लाइटें पहुंचीं
अभी तक नगर निगम में लगभग 23 हजार लाइटें पहुंच चुकी हैं। यह बात अलग है कि जो लाइटें खंभों पर लगे रहते समय सड़कों को जगमग कर रही थीं, अब एकदम से बेकार हो गईं और कबाड़ (स्क्रैप) मानकर गोदाम में डाल दी गईं। इन प्रत्येक नई लाइट की कीमत 25 सौ से 35 सौ रुपये बतायी जा रही है। लेकिन अब इन लाइटों को स्क्रैप में शामिल करके इनकी कीमत को ही खत्म कर दिया गया है।
गांवों में तो हो सकता था उजाला
इन सोडियम लाइटों को कामयाब करने और सरकारी धन की हानि होने से बचाने के लिए गांवों में भी भेजा जा सकता था। इससे जहां गांव जगमग होते तो करीब दस करोड़ रुपये की लाइटें कूड़े में जाने से बच जाएंगी। लेकिन निगम प्रशासन ने सूझबूझ का परिचय न देते हुए इस संबंध में कोई प्रस्ताव नहीं बनाया। केवल लाइटों को खुर्दबुर्द करने की तैयारी की गई।
नीलामी को कमेटी गठित
निगम प्रशासन ने शुरू से ही इन सोडियम लाइटों को स्क्रैप मान लिया। इसलिए नगरायुक्त ने स्क्रैप की नीलामी के लिए कमेटी भी गठित कर दी। कमेटी में अपर नगरायुक्त अध्यक्ष हैं तो चीफ इंजीनियर सहित कई अधिकारी शामिल हैं।
इतने प्रकार की सोडियम लाइटें
- 250, 70, 150, 40 वाट
- सीएफएल - 85 वाट
- ट्यूब लाइट अलग से हैं
15 लाख का ऑफिस बना गोदाम
निगम प्रशासन का खेल भी निराला है। निगम परिसर में जिस ऑफिस को दो माह पहले ही 25 लाख रुपये खर्च कर तैयार किया गया, उसे कबाड़ मान ली गईं लाइटों का गोदाम बना दिया गया। चर्चा है कि निगम को स्क्रैप से उतने पैसे भी नहीं मिलेंगे, जितने इस ऑफिस पर खर्च हो गए। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि निगम प्रशासन सरकारी संपत्ति के रखरखाव को लेकर कितना गंभीर है।
शासन ने नहीं लिया संज्ञान
पूरे देश में सोडियम की जगह एलईडी लाइटें लगायी जा रही हैं। कहीं भी सोडियम लाइटों को लगाना संभव नहीं है। शासन को पुरानी लाइटों के निस्तारण या नीलामी के लिए पत्र भेजा जा चुका है। अभी तक कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है। फिलहाल नीलामी कमेटी बनायी जा चुकी है। -अलीहसन कर्नी, अपर नगरायुक्त
नहीं मिल रहा सहयोग
हमारा काम केवल सोडियम लाइटों की जगह एलईडी लाइटें लगाना है। मौके से पुरानी सोडियम लाइटों को गोदाम तक लाने की जिम्मेदारी निगम की है। फिर भी हमारे कर्मचारी इन लाइटों को गोदाम तक पहुंचा रहे हैं। हमें निगम अधिकारियों का सहयोग नहीं मिल रहा है। -चंदन मोहली, प्रोजेक्ट इंजीनियर ईईएसएल