खस्ताहाल सड़कों से आजिज लोग निगम की नई सरकार बनने के बाद सड़कों की तकदीर बदलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। सात महीने के गुणा-भाग के बाद नगर निगम ने टेंडर प्रक्रिया शुरू की। कई बार टेंडर प्रक्रिया ही अधर में लटक गई। तीन महीने पहले कई कोशिशों के बाद करीब 50 करोड़ की लागत से महानगर में सड़कें बनाने के टेंडर जारी किए गए। सड़कें बनीं तो तीन महीने में ही जिलाधिकारी आवास के सामने, पुलिस लाइन, सर्किट हाउस के पास, गंगानगर डिवाइडर रोड, गंगानगर मेन रोड, पांडवनगर, रक्षापुरम और सूरजकुंड सहित कई सड़कों का सरफेस खराब हो गया। उखड़ती सड़कों पर लोग फिसलकर गिरने लगे।
सूरजकुंड रोड उखड़ी
एक करोड़ चार लाख की लागत से बनी सूरजकुंड रोड फिर उखड़ने लगी है। लोग शिकायतें कर रहे हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य है।
पांडवनगर रोड टूटी
एक करोड़ 40 लाख की लागत से तैयार सड़क तीन महीने बीतने से पहले ही अपनी बदहाली का रोना रोने लगी।
गंगानगर रोड फिर बदहाल
दो करोड़ तीस लाख रुपये की लागत से तैयार गंगानगर रोड भी कई जगह से गड्ढा युक्त हो गई।
ऐसा हुआ था हाल कि रोड खोदकर ट्रॉली में भर ले गए थे
माधवपुरम स्थित प्रेम विहार में सड़कों की गुणवत्ता की पोल 20 दिसंबर 2024 को अमर उजाला ने खोली थी। खराब सड़क बनने पर लोगों के हंगामे के बाद ठेकेदार को 24 घंटे में ही सड़क खोदकर घटिया मेटेरियल ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादकर ले जाना पड़ा था। इसके बाद भी निगम की नींद नहीं टूटी और लगातार सड़कों की खराब हालत के बावजूद निगम ने गुणवत्ता नहीं सुधारी।
ठेकेदारों का अपना तर्क... ट्रैफिक नहीं रोक पाया नगर निगम
घटिया सामग्री लगाकर सड़क निर्माण करने वाले ठेकेदारों का अपना अलग तर्क है। ठेकेदारों के मुताबिक, नगर निगम सड़क बनने के बाद ट्रैफिक रोकने में नाकाम रहा। सड़क निर्माण होते ही ट्रैफिक चल पड़ा। इससे सरफेस उधड़ गया है। ठेकेदारों का दावा कि जिन सड़कों पर ट्रैफिक चालू नहीं हुआ या फिर 15-20 दिन तक भारी वाहन सड़क पर नहीं चला। उनकी हालत ठीक है। अवर अभियंता से लेकर अधिशासी अभियंता ने भी सड़कों की गुणवत्ता के बारे में रिपोर्ट दी है।
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