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मोहर्रम की मजलिसों में देशभक्ति के तराने

Sat, 08 Oct 2016 02:15 AM IST
अमर उजाला ब्यूरों
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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 हुजूर-ए-पाक रसूल अल्लाह सल्लल्लाहूअलैहीवसल्लम के नवासे इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए सैकड़ों सालों से सोगवार मातम कर रहे हैं। मजलिसों में दर्दभरी नौहेख्वानी के साथ जुलूस निकाले जा रहे हैं। अब मातम के बीच देशभक्ति की झलक भी दिखाई दे रही है। अब्दुल्लापुर में मोहर्रम के दौरान शिया समुदाय की ओर से लगाए गए आतंकवाद विरोधी, भाईचारे और देशभक्ति के पोस्टर इसकी गवाही दे रहे हैं। राष्ट्रवाद का यह सिलसिला यहीं नहीं थमता। यहां नौहेख्वानी में हिंदुस्तान की संस्कृति के तराने भी गूंजने लगे हैं।
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मोहर्रम के दौरान हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को मजलिसों में नौहों के रूप में बयां किया जाता है। इसे सुनकर सोगवार रो पड़ते हैं। मेरठ में अब्दुल्लापुर के जुलूस और मजलिसों की खास अहमियत है। दो साल पहले अब्दुल्लापुर में मोहर्रम के जुलूस में मातमी काले झंडों के बीच युवक तिरंगा लेकर चले थे। अब यह यह रवायत लखनऊ तक पहुंच चुकी है।

नौहेख्वानी में देशप्रेम के रंग
अब्दुल्लापुर के युवा गायक सैयद मीसम नकवी के नौहों में हिंदुस्तानियत का पैगाम सुना जा सकता है। शिकारपुर के शायर अजीम करबलाई के लिखे नौहों को मीसम ने शानदार तरीके से गाया है। मीसम और करबलाई के अनुसार, हुसैन जब करबला (इराक) में जंग कर रहे थे, तो उन्होंने हिंदुस्तान जाने की इच्छा जताई थी।
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नौहों के मुख्य बंद
कहा हुसैन ने हिंदोस्तान जाने दे, न कर सितम मुझे दुनिया नई बसाने दे, वहां के लोग... हर एक दिल को मिलाने का काम करते हैं, लइने (लश्कर) काट दिये तुमने गाजी के बाजू, ये सुन के हिंद के वासी बहाएंगे आंसू, अलम (ध्वज) तू भाई का लेकर वहां तो जाने दे, कहा हुसैन ने हिंदोस्तान जाने दे...।
मेरी सवारी के कदमों पे सिर को टेकेंगे, तू एक बार मेरा जुलजुनाह तो जाने दे, कहा हुसैन ने हिंदोस्तान जाने दे...। हसन अजीम वो एक रोज जल्द आयेगा, दिलों में दर्द के जज्बे को जाग जाने दे, कहा हुसैन ने हिंदोस्तान जाने दे...।

आतंकवाद पर भी चोट
आईएसआईएस कमांडर के आतंकी हमलों पर भी नौहे से वार किया। कहा कि ‘जिसने फातिमा का घर जलाया है, रूप वो बदलके फिर से आया है, बगदादी के हर जुल्म को मिटाना है, वारिसे हुसैन अभी जिंदा हैं’...।

स्लोगन से संदेश
मेरठ-परीक्षितगढ़ मार्ग पर स्थित अब्दुल्लापुर में शिया समुदाय के लोग काफी संख्या में रहते हैं। अब्दुल्लापुर में घुसते ही बस स्टैंड पर बायीं तरफ एक बड़ा होर्डिंग लगा है, जिस पर लिखा है ‘मोहर्रम आतंकवाद के खिलाफ आंदोलन का नाम है।’ आगे चलेंगे तो गलियों की दीवारों पर जगह-जगह स्लोगन लिखे पोस्टर लगे हैं। इन पर लिखा है कि ‘दुनिया की तमाम उलझनें खत्म हो सकती हैं, अगर जाहिल खामोश रहें और आलिम हक बयान करने लगें’।

युवा शायर और नौहेख्वान लाए बदलाव
अब्दुल्लापुर में इस समय चार युवा नौहेख्वानों की टीम है। ये नौहेख्वान सैयद मीसम नकवी, खुर्शीद, अम्मारे यासिर और जामिन हुसैन हैं। मीसम नकवी ने बताया कि वे लोग शिकारपुर के रहने वाले शायर अजीम करबलाई, नौगांवा निवासी मौलाना वसी हैदर, कमर छोलसी और अब्दुल्लापुर के ही मंजर अब्बास के लिखे बंद गाते हैं।

मीसम की पांचवीं एलबम
सैयद मीसम पांच साल से अपनी नौहेख्वानी की ऑडियो डीवीडी तैयार करा रहे हैं। इस साल उनका पांचवां वॉल्यूम आया है, जिसमें ‘कहा हुसैन ने हिंदोस्तान जाने दे..’ भी शामिल है। एलएलबी थर्ड ईयर के छात्र मीसम शौकिया नौहेख्वान हैं, लेकिन दूर-दूर तक नौहाख्वानी करने जाते हैं। मीसम ने बताया कि एक डीवीडी तैयार कराने में 50-60 हजार का खर्च आता है। इसके बाद उसकी तीन हजार कॉपी तैयार कर फ्री में मजलिसों में बांटते हैं। अगर बाहर नौहेख्वानी के लिए जाते हैं, तो उनके साथ 50 लड़कों की टीम होती है। वह सिर्फ आने-जाने का किराया लेते हैं, नौहेख्वानी का उन्होंने आज तक कोई पैसा नहीं लिया। अब्दुल्लापुर के बाकी युवा नौहेख्वान भी उनके साथ बिना किसी स्वार्थ के काम करते हैं।

इस बार भी जुलूस में फहरायेगा तिरंगा
मीसम का कहना है कि पिछले दो साल से हम जुलूस में तिरंगा लेकर चलते हैं। इस बार भी युवाओं की टीम मातमी अलम के साथ तिरंगा लेकर चलेगी। क्योंकि, हुसैन साहब की आखिरी ख्वाहिश हिंदुस्तान में आकर रहने की थी, उन्हें हिंद से प्यार था। हम भी हिंद के रहने वाले हैं और हमें भी इससे प्यार है।

आतंकवाद की मुखालफत
मीसम ने बताया कि मजलिसों में हुसैन साहब की शहादतों का जिक्र होता है। इसके अलावा हम भारत की सरजमीं पर होने वाले आतंकी हमलों का भी विरोध करते हैं। मौलाना सबको प्यार और भाईचारे के साथ रहने का पैगाम देते हैं।
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