ज्योतिषविद विभोर इंदुसुत कहते हैं कि शनि जयंती पर 30 साल बाद अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में शनि बैठकर शश नामक योग बना रहे हैं। सावित्री ने अपनी साधना और सतीत्व के बल पर यमदेव को सत्यवान के प्राण वापस लौटाने के लिए विवश कर दिया था। तभी से इस दिन को वट सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाने लगा।
पंडित विनोद त्रिपाठी कहते हैं कि व्रत पूजन विधि के अनुसार महिलाओं को बरगद के वृक्ष को मीठे जल और दूध से सींचकर घी का दीपक जलाकर सावित्री सत्यवान की प्रतिमा, हाथ का पंखा, फल-फूल, श्रृंगार सामग्री अर्पित कर पति की दीर्घायु की कामना करें।
क्या दान करें
-अपने पितरों के निमित्त दूध और सफेद मिठाई मंदिर में दान दें।
-किसी भी मंदिर में वट वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दिया जलाएं।
-उड़द की दाल की खिचड़ी का प्रसाद वितरित करें। वृद्धाश्रम व कुष्ठाश्रम में भोजन सामर्थ्य अनुसार दान दें।