जेल में मनी होली-दीवाली
आपातकाल के दौरान मेरठ कॉलेज से एलएलबी कर रहे अरुण वशिष्ठ भी 19 माह जेल में रहे। सत्याग्रह के दौरान उनके खिलाफ पांच मुकदमे दर्ज हुए। हाथ न आने के कारण उनके घर की कुर्की हुई। इसके बाद भी वह आंदोलन में सक्रिय रहे। 16 जुलाई को गिरफ्तारी हुई। छूटने के बाद दोबारा आंदोलन किया। दोबारा गिरफ्तार होने के बाद आठ मार्च 1977 को जेल से छूटे। होली, दीवाली, दशहरा सब जेल में ही मनाया था।
महिलाओं ने दी थी गिरफ्तारी
सिविल लाइन के मानसरोवर में किराये पर रहने वाली कृष्ण कान्ता तोमर अपने पांच वर्षीय पुत्र धर्मेन्द्र तोमर और अपनी मकान मालिक कृष्णा वत्स के साथ नारेबाजी करती हुईं बेगमपुल पहुंच गईं। वहां से लालकुर्ती थाने पहुंच गईं तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। कृष्ण कान्ता और कृष्णा वत्स को जेल भेज दिया। एक माह बाद उनकी रिहाई हुई।
45 साल बीते मगर वो समय नहीं भूले
मेरठ में पल्हैड़ा निवासी लोकतंत्र सेनानी 75 वर्षीय जन्मेजय चौहान कहते हैं, 45 साल बीत गए, लेकिन आज तक वो समय नहीं भूले। उनके छोटे भाई शीलेंद्र चौहान ने बताया कि हमारी बेगमपुल पर रेडियो रिपेयरिंग की दुकान थी। नौ दिसंबर 1975 को भाई जन्मेजय चौहान तीन लोगों के साथ जेल गए थे। उन्हें बहुत यातनाएं दी गईं। छह माह बाद उनकी जमानत हुई। इसके बाद भी उन्होंने संघ के लिए काम करना जारी रखा। उनके पीछे सीआईडी लगी थी। खूनी पुल से संघ के नगर प्रचारक रामलाल और वीरेंद्र के साथ उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। इमरजेंसी खत्म होने के बहुत दिनों बाद उन्हें रिहाई मिली।
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