इस अवसर पर ऐतिहासिक नगरी में पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं को प्रवचन देते हुए आचार्य सुनील सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि यह हस्तिनापुर की पावन भूमि प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है। यह भूमि बहुत ही पवन है। यहां आने से मन में बड़ी विशुद्धी का संचार हुआ है। इस भूमि से तीन तीर्थंकर भगवानों ने चार-चार कल्याणक प्राप्त किये।
तीर्थंकर भगवान हमें यही शिक्षा देते है कि जीवन में शांति, सुख पाना है तो अपने आप को संसार की परवस्तुओं से हटकर स्वातत्व की और आना होगा। एवं मन, वचन, काय पर वहीं महान पुरूष विजय प्राप्त कर सकता है जो अपने जीवन को सयमंय बनाता है वाणी से मनुष्य उच्च उपलब्धि प्राप्त कर सकता है एवं वाणी से ही नीच गति का बंध कर लेता है हमें अपनी वाणी को विवेक पूर्वक बोलना चाहिए।
प्रवचन के मध्य कहा कि हमारा शुद्ध, मन, वचन और कर्म से किया आचरण संस्कृति की रक्षा कर सकता है। श्रमण संस्कृति की रक्षा के लिए अपने पुरातत्व निर्गन्त मुनियों की सुरक्षा रखना आवश्यक है। प्रवचन के पश्चात् सभी मुनि महाराज की आहार चर्या निर्विघ्न रूप से सम्मपन हुई।
सांयकालीन बेला में संगीतमय गुरूभक्ति की गई एवं 1008 दीपको से भक्तामर दीप अर्चना की गई। जिसमें अनेक श्रद्धालुओं ने भाग लिया। जिसमें बाहर से पधारे हुए संगीतकार अक्षत जैन, शुभम जैन, प्रथम जैन ने अपनी भक्ति भजन के माध्यम से जीनेन्द्र भगवान एवं गुरूओं की आराधना करवाई।
इस अवसर पर कार्यक्रम को सफल बनाने में क्षेत्र के अध्यक्ष जीवेन्द्र कुमार जैन, महामंत्री मुकेश जैन, कोषाध्यक्ष राजेंद्र कमार जैन, मंत्री राजीव जैन, मंत्री राजीव जैन, सुनील जैन, सुशील जैन, विजय कुमार जैन, आदि अनेक स्थानों से महानुभव उपस्थित रहे।