मेडिकल कॉलेज में दवाओं का भारी टोटा है। पिछले तीन-चार महीने में मरीजों की अधिक संख्या के कारण दवाइयों का स्टाक खत्म होने लगा है। एंटी बायोटिक, पेनकिलर, एंटी एलर्जी से लेकर इंसुलिन का इंजेक्शन तक उपलब्ध नहीं है। कॉलेज प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को भी दवाइयां देनी बंद कर दी हैं। चिकनगुनिया, डेंगू और वायरल ने दवाइयों का बजट बिगाड़ दिया है। कॉलेज प्रशासन ने शासन से जल्द बजट देने की गुहार लगाई है।
वित्तीय वर्ष में मेडिकल कॉलेज को दवाएं, गैस व केमिकल खरीदने के लिए 1.75 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। यह पैसा एक माह पहले खत्म हो चुका है। स्टाक में रखी दवाओं से ही किसी तरह काम चल रहा है। लेकिन अब दवाएं खत्म होने लगी हैं। हालत यह है अगर इमरजेंसी केस में किसी मरीज को हैवी ट्रीटमेंट देने पड़ जाए तो उसके लिए भी दवाएं नहीं हैं। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए सवा चार करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया था, जिसके जरिये दवाएं, केमिकल, गैस व अन्य सामान की खरीदी की जानी है। सरकार से निर्धारित बजट में से पहली किस्त के तौर पर 1.75 करोड़ रुपया जारी किया, जो काफी पहले ही खर्च हो चुका है। अब कॉलेज ने शासन को पत्र लिखकर तत्काल अगली किस्त जारी करने की मांग की है। लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
शुगर, बीपी और न्यूरो का इलाज मुश्किल
पिछले 15 दिन से शुगर, बीपी और न्यूरो से जुड़ी बीमारियों के इलाज में सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। तमाम दवाएं खत्म हो चुकी हैं। फार्मेसी अधिकारी योगेंद्र पाल सिंह का कहना है कि सुपर स्पेशियलिटी के जितने भी विभाग हैं उनकी 80 से 90 फीसदी दवाएं खत्म हैं, जो दवाएं उपलब्ध है उनका इस्तेमाल बाकी बीमारियों में भी किया जाता है।
तीन-चार महीने में मरीज हुए दोगुने
कॉलेज ने मरीजों की संख्या को देखते हुए चालू वित्तीय वर्ष में सरकार से 12 करोड़ रुपये का बजट मांगा था। लेकिन सरकार ने उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं की। बजट बीते वित्तीय वर्ष के जितना ही रखा, जबकि इस साल मरीजों की संख्या दो गुना से ज्यादा हो गई है। बीते साल एक दिन में 2 से ढाई हजार मरीजों की ओपीडी होती थी, जो इस बार बढ़कर चार से साढ़े चार हजार प्रतिदिन तक आ गई है। ऐसे में दवाओं को टोटा पड़ना लाजमी है।
अब बुखार की कंपलीट दवाएं नहीं
कॉलेज में इस समय बुखार का इलाज भी पूरी तरह नहीं हो सकता है। क्योंकि चिकनगुनिया, डेंगू और वायरल में काम आने वाली दवाएं भी मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध नहीं है। अगर बुखार का कोई गंभीर केस कॉलेज में आ जाए तो बड़ी समस्या होगी। अधिकांश मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।