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आंखों के सामने बेटे का कराया था पोस्टमार्टम, इंसाफ की लंबी लड़ाई

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मेरठ। मेडिकल के छात्र सिद्धार्थ चौधरी की मौत को सामान्य बताकर कॉलेज प्रशासन ने पल्ला झाड़ लिया था। कोई भी कानूनी कार्रवाई करने को तैयार नहीं था, लेकिन माता पिता को सब्र नहीं आया। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनके 23 साल के इकलौते बेटे की मौत सामान्य नहीं है, उसकी हत्या हुई है। डॉक्टर दंपती जिद पर अड़े और बोले कि बेटे का पोस्टमार्टम वह अपनी आंखों के सामने कराएंगे। यह बात पुलिस प्रशासन ने मान ली। कई सुबूत भी मिले, उसके आधार पर दंपती ने हत्या का केस कराया और इंसाफ के लिए 15 साल की कानूनी लड़ाई भी लड़ी। हत्यारों को उम्रकैद की सजा होने पर दंपती के आंखों में आंसू आ गए।
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सिद्धार्थ के माता-पिता दोनों डॉक्टर हैं। मुजफ्फरनगर स्थित भोपा रोड पर किसान नर्सिंग होम के संचालक हैं। डॉक्टर दंपती ने इकलौते बेटे सिद्धार्थ को पढ़ाया। बेटा होनहार था, सीपीएमटी की पहली परीक्षा में ही एमबीबीएस में सेलेक्शन हो गया। लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज में बेटे का दाखिला कराया। छह जुलाई को वह मनहूस दिन था, जब उन्हें बेटे की मौत की सूचना मिली। बताया गया कि हास्टल के कमरा नंबर 38 में रात में एक ही तख्त पर सचिन मलिक और सिद्धार्थ सोए थे। बेटे की मौत की खबर सुनते ही डॉ. सुरेंद्र और उनकी पत्नी मेडिकल कॉलेज पहुंच गए, पर कोई यह बताने के लिए तैयार नहीं हुआ कि उस रात क्या हुआ था? आश्चर्यजनक तरीके से सचिन को भी सिद्धार्थ के मौत की जानकारी नहीं हुई।
कलेजे में पत्थर रखकर आंखों के सामने कराया पोस्टमार्टम
मेडिकल के डॉक्टर जीके अनेजा व डॉ. तुंगवीर सिंह आर्य ने सिद्धार्थ की मौत की पुष्टि की थी। डॉक्टर दंपती ने हास्टल के सहायक वार्डन डॉ. विजय अग्रवाल और एमबीबीएस के छात्रों से बेटे की मौत का कारण पूछ रहा था, लेकिन कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ। दंपती को सचिन ने सिर्फ इतना बताया कि सिद्धार्थ सुबह मृत हालत में उसको मिला था। डॉक्टर दंपती उस समय आश्चर्यचकित रह गया, जब पुलिस ने सिद्धार्थ को नशे का आदी बताकर पल्ला झाड़ लिया। पुलिस और कॉलेज प्रशासन सिद्धार्थ की मौत में कोई कार्रवाई नहीं कराना चाह रहा था। दंपती ने खुद को संभाला और इंसाफ की आवाज उठाई। खुद को डॉक्टर होने का हवाला देकर जिद करके बेटे का पोस्टमार्टम अपनी आंखों के सामने कराया।
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खामोश था मेडिकल कॉलेज प्रशासन, कार्रवाई में साधी थी चुप्पी
मेडिकल के छात्र सिद्धार्थ की मौत का मामला लखनऊ तक गूंजा था। पुलिस प्रशासन व कॉलेज प्रशासन एक ही सूर में बोल रहे थे कि सिद्धार्थ की स्वाभाविक मौत है। सिद्धार्थ के पिता डॉ. सुरेंद्र ग्रेवाल के समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करें? उनके एक बेटी भी है, जो माता-पिता के साथ मेडिकल आई थी। बेटी बार बार माता पिता का हौसला बंधा रही थी। उसके बाद तीनों एक जगह पर बैठे और इंसाफ के लिए लड़ाई लड़ने का फैसला लिया।
नशे का आदी बताकर पुलिस ने भी झाड़ा था पल्ला
छात्र सिद्धार्थ की मौत के मामले में मेरठ पुलिस का भी बेहद खराब रवैया था। सिद्धार्थ का नशे का आदी बताकर पुलिस ने कार्रवाई से पल्ला झाड़ लिया था। कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी पुलिस ने खूब लापरवाहियां की। कोर्ट इस मामले में गंभीर था। डॉक्टर दंपती हर तारीख पर कोर्ट में आकर इंसाफ की गुहार लगाता था। एक-एक सुबूत डॉ. सुरेंद्र ग्रेवाल ने जुटाए। फोरेंसिक लैब के विसरा रिपोर्ट लाने के लिए कई बार डॉक्टर दंपती पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों से मिला।
पापा मेरे दोस्तों का आम पसंद है, ले आने
पांच जुलाई को सिद्धार्थ ने अपने माता पिता से आखिरी बार बात की थी। छह जुलाई को डॉक्टर दंपती को बेटे से मिलने के लिए मेडिकल कॉलेज आना था। सिद्धार्थ ने अपने पापा से कहा था कि मेरे दोस्त सचिन मलिक और अन्य दोस्तों को आम पसंद है, ले आना। छह जुलाई सुबह छह बजे डॉक्टर के फोन पर कॉल गई कि बेटे की मौत हो गई। यह सुनकर दंपती बेहोश हो गए। जैसे तैसे कर मेरठ पहुंचे थे।
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