1857 के आंदोलन में जनपद के सभी राजाओं ने आपस में तय कर के नवाब महमूद को जिले की कमान अंग्रेजों से दिलाई थी। किंतु नवाब के एक सिपहसालार की करतूत से लड़ाई हिंदू और मुस्लिम में बंट गई। जनपद के हिंदू राजा अंग्रेजों के साथ हो गए। लगभग एक साल की आजादी के बाद जनपद को फिर से गुलामी का शिकार होना पड़ा। लेकिन इसके बाद सब सचेत हो गए। अंग्रेजों के खिलाफ जनपद के सारे हिंदू मुस्लिम एकजुट थे। कांग्रेस और आर्य समाज उनमें देश भक्ति की भावना फूंकने में लगे थे। ऐसे समय में महात्मा गांधी का जनपद में आगमन हुआ।
13 अक्तूबर 1929 के दिन विजय दशमी थी। इसी दिन महात्मा गांधी धामपुर पधारे। पूरे जनपद के आजादी के दीवाने विजय दशमी का पूजन छोड़कर धामपुर पहुंचे। महात्मा गांधी लगभग 11 बजे ट्रेन से धामपुर पहुंचे। उनका केएम कॉलेज में प्रवास था, वहीं सभा थी। स्टेशन पर ही भारी भीड़ थी।
उस समय के अखबारों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि गांधी जी को सुनने आने वालों की संख्या भी 15 हजार से ज्यादा थी। जबकि उस समय धामपुर की आबादी मात्र सात हजार ही थी। सभा का प्रबंध बहुत बढ़िया था।
खुद महात्मा गांधी ने कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा था कि यहां की सभा का प्रबंध उत्तर प्रदेश के दौरे की सभी सभाओं से बढ़िया रहा। सभा में जनपद की ओर से गांधी जी को 644 रुपये चार आना की थैली भेंट की गई। विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें सम्मान पत्र भी दिए।
ज्ञातव्य है कि महात्मा गांधी चर्खा संघ के मैनेजर डॉ. जसवंत सिंह के कहने पर धामपुर आए थे। स्वागत सभा के मंत्री डी गांगुली ने गांधी जी के कार्यक्रम के लिए अपनी प्रकाशित रिपोर्ट में कहा है कि महात्मा गांधी के भाषण से जनपद के युवाओं में नई चेतना जागृत हुई।
अनेक कार्यकर्ता अपना व्यवसाय और सरकारी नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें गोविंद सहाय, चौधरी होरी सिंह, विशंभर नाथ माहेश्वरी, राम निवास, चोखे लाल, पंडित वाचस्पति, सोमदेव, चंद्र शेखर गोयल, लाला मुन्ना लाल, मक्खन सिंह त्यागी, चौधरी चंदन सिंह आदि प्रमुख हैं। इन्होंने कांग्रेस का संदेश गांव गांव तक पहुंचाया, ये ही आगे चलकर बड़ा आंदोलन बना।