बरनावा में इतिहास के राज जानने के लिए पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में बुधवार से विधिवत उत्खनन होगा। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में उत्खनन की मंजूरी दी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की संयुक्त टीम उत्खनन करेगी। दोपहर दो बजे उत्खनन कार्य शुरू होगा। बरनावा हिंडन और कृष्णा नदी से घिरा हुआ है। इसके पास ही शेखपुरा में दोनों नदियां एक हो जाती है। टीले पर गुंबद है और यहीं से एक गुफा निकलती है।
सिनौली, चंदायन और अब बरनावा
वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया। यहां हड़प्पा कालीन शवादान गृह मिला। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई। इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं। निदेशक पुरावशेष डॉ. डीएन डिमरी ने बताया कि उत्खनन का उद्देश्य यह जानना है कि इस क्षेत्र में किन-किन सभ्यताओं के अवशेष हो सकते हैं। यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि बरनावा का महाभारत काल से कितना और कैसा संबंध रहा है। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में खुदाई का कार्य किया जाएगा।
इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी की टीम पहुंची
उत्खनन में सहयोग के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के 15 छात्र-छात्राओं का दल भी बरनावा पहुंच चुका है। सहायक पुरातत्व विद डॉ. प्रियंक गुप्ता के नेतृत्व में छात्र पहुंचे हैं। बुधवार से होने वाले उत्खनन कार्य के दौरान छात्र भी सहयोग करेंगे।
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