पुरा गांव में जहां परशु रामेशवर मंदिर हैं, कभी यहां कजरी वन था। ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ आश्रम में रहते थे, एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार खेलते हुए इधर से गुजरे। रात होने को थी तो राजा साथियों के साथ आश्रम पहुंचा। ऋषि जमदग्नि की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी रेणुका ने कामधेनू गाय की कृपा से राजा का आदर सत्कार कर राजसी व्यंजन खिलाए, इससे राजा बहुत ही प्रभावित हुए।
राजा ने रेणुका से कामधेनू गाय की मांग की, मना करने पर राजा ने जबरदस्ती गाय को साथ लेकर जाने का प्रयास किया। असफल रहने पर राजा गुस्से में आकर रेणुका को ही बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर ले गया और वहां एक कमरे में बंद कर दिया। जब ऋषि जमदग्नि शाम तक आश्रम पहुंचे तो वहां रेणुका को न पाकर परेशान होकर खोजने लगे। राजा सहस्रबाहु की अनुपस्थिति में रानी ने रेणुका को मुक्त कर दिया। रेणुका ने अगले दिन आश्रम पहुंचकर ऋषि को पूरा मामला बताया।
मां का सिर धड़ से अलग कर दिया
पुरा महादगेव मंदिर
इस पर ऋषि राजा के प्रति गुस्से मे भर गया, लेकिन उसने रेणुका को भी अपने साथ रखने से मना कर दिया। क्योंकि वह परपुरूष के यहां एक रात ठहर कर आयी थी। ऋषि की दृष्टि में वह अपवित्र हो गई थी। इस पर रेणुका ने प्रार्थना की वह आश्रम छोड़कर अन्य कहीं नहीं जाएगी। चाहे तो वह उसका सिर काट दें। गुस्साए ऋषि ने अपनी पत्नी का सिर काटने के लिए अपने पुत्रों को बुलाया, पहले तीन पुत्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया। ऋषि ने उन्हें श्राप देकर पत्थर बना दिया। इसके बाद चौथे पुत्र राम को बुलाकर रेणुका का सिर काटने का आदेश दिया, राम पितृ भक्त था उसने अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया। मां का सिर धड़ से अलग करने पर राम को पश्चाताप हुआ। इसके बाद वह कुछ दूर जाकर शिवलिंग बनाकर घोर तप करने लगा। घोर तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उसे साक्षात दर्शन दिए और वर मांगने के लिए कहा। राम ने भगवान शिव से माता के जीवन की मांग की। शिव ने प्रसन्न होकर एक परशु (फरसा) भी दिया तथा कहा कि यह परशु युद्ध में तुम्हारी विजय करेगा। भगवान शिव की ओर से दिए गए परशु (फरसे) के बाद उन्हें परशुराम के नाम से जाना गया, वही उनकी माता रेणुका को भी जीवनदान मिल गया। परशुराम ने जो शिवलिंग बनाया था वह यही है, जिसे आज पुरा गांव में पुरा महादेव मंदिर के नाम से पूजा जाता है।
ऐसे हुआ मंदिर का निर्माण
पुरा महादेव मेला
कथा प्रचलित है कि काफी दिनों तक मंदिर खंडहर मे तब्दील रहा। एक दिन लंढौरा के राजा रामदयाल की पत्नी इधर घूमने आयी, तो उसका हाथी यहा आकर बैठ गया। काफी प्रयास के बाद भी हाथी नही उठा तो रानी ने उस जगह को खोदने का आदेश अपने सैनिको को दिया। खोदने पर वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ, तब रानी ने वहा मंदिर का निर्माण कराया। यहीं पर कांवडि़ए भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।
मंदिर समिति अध्यक्ष अरूण शर्मा और उपाध्यक्ष एडवोकेट सुरेंद्र यादव बताते हैं कि इसी जगह पर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्ण बोधाश्रम ने भी तपस्या की थी । मंदिर को जगतगुरु शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने। परशुरामेश्वर महादेव मंदिर नाम दिया है।