मेरठ में 11-12 अगस्त को होने वाली भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक आम बैठक नहीं है। इसमें उस व्यूह की रचना का पूरा खाका खींचा जाना है, जिसके जरिए 2019 के चुनावी समर में भाजपा उतरने जा रही है। समिति में जहां अन्य मुद्दों पर बात होगी तो बड़ा मुद्दा यह होगा कि दलित और सवर्णों को एक नाव में कैसे सवार किया जाए। आशंका है कि एससी/एसटी एक्ट में विधेयक पास होने के बाद कहीं सवर्ण खफा न हो जाएं।
दलितों से जुड़े मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। इसे पलटते हुए राज्यसभा ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण संशोधन विधेयक 2018 को मंजूरी दे दी है। यह वही एक्ट है जिसमें सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से खफा दलित सड़कों पर उतर आए थे। इसी साल दो अप्रैल को बड़ा बवाल हुआ था। खास तौर पर मेरठ में बसें फूंक दी गईं। भारी उपद्रव हुआ। अब भाजपा ने इस एक्ट पर विधेयक लाकर दलितों को साधने का बड़ा दांव तो खेल दिया पर इससे कहीं न कहीं भाजपाई रणनीतिकार चिंतित हैं। खतरा है कि कहीं सवर्ण नाराज न हो जाएं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को ठाकुर, वैश्य, ब्राह्मण समेत सभी सवर्णों का तगड़ा समर्थन मिला था। नतीजा यह रहा कि भाजपा सिरमौर हो गई।