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खास रिपोर्ट: दो सीटों पर होगा पश्चिमी यूपी का सबसे बड़ा दंगल, जाट राजनीति की दिशा तय करेगा यह चुनाव

Sat, 23 Mar 2019 11:41 AM IST
Dimple Sirohi जगेंद्र उज्ज्वल/ मदन बालियान, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर/ बागपत
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अजित सिंह, संजीव बालियान - फोटो : फाइल
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लोकसभा क्षेत्र मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, बिजनौर और सहारनपुर प्रत्याशियों की स्थिति लगभग साफ हो गई है। कैराना में भाजपा प्रत्याशी कौन होगा, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है, अन्य सीटों पर तमाम अटकलों को विराम देते हुए निवर्तमान सांसदों पर ही भरोसा किया गया है। तीन बड़े दलों सपा, बसपा और रालोद के बीच गठबंधन होने से इस बार समीकरण बदले हुए हैं। प्रत्याशियों की घोषणा के बाद बन रहे सियासी समीकरणों और प्रत्याशियों की ताकत व कमजोरियों पर केंद्रित अमर उजाला की खास रिपोर्ट-

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रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के बीच मुजफ्फरनगर में सीधा मुकाबला है। पहली बार चौधरी अजित सिंह बागपत के बाहर किसी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस के यहां प्रत्याशी नहीं उतराने से मुकाबला काफी अहम हो गया है।

पिछले चुनाव में इक तरफा संजीव बालियान को मिला जाट वोट इस बार किधर जाएगा, यह भी बड़ा सवाल है। वह चौधरी अजित सिंह के साथ जाएगा या संजीव बालियान के या फिर दोनों के बीच बंटवारा होगा। जाटों के दिल में छोटे चौधरी राज करेंगे या फिर संजीव बालियान नई उम्मीद बन कर उभरेंगे, यह चुनाव परिणाम तय करेगा।

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रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह के चुनाव लड़ने से मुजफ्फरनगर सीट पर देशभर की निगाहें लगी हैं। रालोद मुखिया के चौधरी अजित सिंह के पास लंबा सियासी अनुभव है। उनके मुकाबले पर भाजपा ने निवर्तमान सांसद डाक्टर संजीव बालियान पर ही भरोसा किया है, जिन्हें सियासत में आए करीब सात साल हुए हैं। 

2014 के चुनाव में संजीव बालियान ने बसपा के कादिर राणा को चार लाख मतों के अंतर हराया था। तब सपा से वीरेंद्र सिंह और रालोद-कांग्रेस गठबंधन से पंकज अग्रवाल भी मैदान में थे। सपा, बसपा और कांग्रेस को मिले कुल मतों से अधिक दो लाख 27 हजार वोट भाजपा को मिले थे। उस समय मोदी लहर और दंगों का भी असर था। रालोद को चुनाव में दलित-मुस्लिम और जाट मतदाताओं पर भरोसा है, जिनकी संख्या इस सीट पर करीब एक लाख 70 हजार है। 

ये भी है एक गणित- साल 2014 में इस तरह मिले थे वोट
संजीव बालियान (भाजपा)   653391
वीरेंद्र सिंह (सपा)       160810
पंकज अग्रवाल (रालोद+कांग्रेस)        12937
कादिर राना (बसपा)       252241 
सपा+रालोद+बसपा        425988

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट -
रालोद की ताकत भाजपा की ताकत
मुस्लिम-दलित और जाट मतदाताओं का वोट बैंक। सवर्ण और अति पिछड़ी जातियों की एक जुटता।
चौधरी अजित सिंह का लंबी सियासी पारी का अनुभव। संजीव बालियान का लोगों के बीच सक्रिय रहना ।
बसपा-सपा के संगठन का साथ, कांग्रेस का कोई प्रत्याशी नहीं होना। पार्टी संगठन का मजबूत और शहरी मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रालोद की कमजोरी।
 
रालोद की कमजोरी भाजपा की कमजोरी 
सवर्ण और अति पिछड़ों में रालोद के पास मजबूत लीडरशिप न होना। चौधरी अजित सिंह के मुकाबले पर जाट मतों को पाने की चुनौती।
भाजपा के मुकाबले संगठनात्मक स्तर पर टीम मजबूत न होना। अनुसूचित जाति के मतदाताओं की नाराजगी, भीम आर्मी भी एक फैक्टर।
शहरी मतदाताओं के बीच पार्टी की कमजोर पकड़। इस बार पूरा विपक्ष एक साथ, विरोधी मतों नहीं होगा बिखराव।

कैराना के उपचुनाव से बदले समीकरण 
रालोद समर्थक चौधरी चरण सिंह परिवार की साख का हवाला दे जाटों के बीच जा रहे हैं तो भाजपा और संजीव बालियान को भरोसा है कि मोदी सरकार के कार्यकाल, सवर्ण और अति पिछड़ों के साथ जाट मतों में भी उन्हें ही मिलेंगे। भाजपा की बड़ी मुश्किल जाट मतदाता ही हैं। कैराना उप चुनाव में जाट वोट भाजपा से खिसक गया था।
 
इस बार जाट वोटरों की पहली पसंद छोटे चौधरी बनेंगे या बालियान इसे लेकर सियासी बहस भी हो रही है। जाट मतों में बंटवारा हुआ तो गठबंधन को नुकसान हो सकता है। बड़ी चुनौती अनुसूचित जाति के वोटों को लेकर भी है। यह बसपा का बेस वोट है यह पूरी तरह से शिफ्ट हो गया तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ जाएगी। 

सत्यपाल सिंह, जयंत चौधरी - फोटो : अमर उजाला
बागपत में वजूद बचाने और बनाने की चुनौती
लोकसभा चुनाव के महासमर में इस बार बागपत सीट पर भाजपा और रालोद के बीच कांटे की टक्कर होगी। रालोद प्रत्याशी जयंत चौधरी के सामने विरासत में मिली सियासत का वजूद बचाने की चुनौती है तो भाजपा रालोद के गढ़ में फिर से जीतकर वजूद बनाने की चुनौती है। रालोद को इस बार सपा, बसपा और कांग्रेस का भी साथ है। 

चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि पर उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में जयंत चौधरी इस बार मैदान में हैं। जाटों का भावनात्मक रूप से जुड़ाव चौधरी चरण सिंह और उनके के परिवार से रहा है। रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह ने बागपत से ही दशकों तक राजनीति की, पारिवारिक पृष्ठभूमि का लाभ कहीं न कहीं रालोद को होगा। साल 2014 के मुकाबले सपा, बसपा और रालोद के बीच गठबंधन होने और कांग्रेस के प्रत्याशी नहीं उतारने से मजबूत समीकरण और सीधा मुकाबला होता दिख रहा है। पिछले चुनाव में रालोद तीसरे स्थान पर रही थी।

बागपत लोकसभा क्षेत्र में करीब 4.35 लाख जाट वोट है। इसके अलावा 3.25 लाख मुस्लिम, अनुसूचित जाति के मतों की संख्या करीब 2.25 लाख हैं। लेकिन भाजपा समर्थकों का भी अपना गणित है। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति के वोटों में  वाल्मीकि, हिंदू धोबी, कोरी, धनगर और खटीक मतदाता भी है जो भाजपा को वोट करता है। बागपत में भी जाट मतों पर दारोमदार है। वे एक जुट होंगे या उनमें बिखराव होगा, यही हार जीत का आधार होगा।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डॉक्टर सत्यपाल सिंह दूसरी बार भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। भाजपा सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग मतदाताओं के साथ, प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे और बागपत में हुए विकास कार्यों पर भरोसा है। दिल्ली-सहारनपुर हाइवे, मेरठ-सोनीपत हाइवे, छपरौली पुल, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे और बावली में केंद्रीय विद्यालय आदि कार्यों को जनता के बीच गिना रहे हैं। भाजपा की बड़ी चुनौती उसकी आपसी अंतर कलह भी है। सांसद और विधायकों के बीच कई मुद्दों पर अंतर विरोध सामने आए हैं। 
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ये भी है एक गणित
डॉ सत्यपाल सिंह(भाजपा)   4,23,475
गुलाम मोहम्मद (सपा)       2,13,609
अजित सिंह (रालोद)        1,99,516
प्रशांत चौधरी (बसपा)       1,41,743
सपा+रालोद+बसपा        554868

बागपत लोकसभा सीट 
  सत्यपाल सिंह    जयंत चौधरी
ताकत भाजपा प्रत्याशी की लोगों के बीच विकास का विश्वास जगाने में कामयाब हुए हैं। ताकत रालोद, सपा और बसपा गठबंधन जयंत चौधरी की सबसे बड़ी ताकत है।
कमजोरी भाजपा में अंतर्कलह प्रत्याशी की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो सकती है। कमजोरी पिछले चुनावों में खिसकता जाट वोट बैंक कमजोरी है। संगठन का कमजोर होना।
अवसर जाट वोटों का धु्रवीकरण, अन्य मतों की एकजुटता और पीएम मोदी का चेहरा अवसर पैदा कर रहा है। अवसर गठबंधन के समीकरण और परिवार से लोगों का भावनात्मक जुड़ाव अवसर पैदा कर रहा है।
चुनौती सबसे बड़ी चुनौती सपा, बसपा और रालोद के गठबंधन की ताकत में सेंध लगाने की है। कांग्रेस के मैदान से हटने के कारण गठबंधन की ताकत और अधिक बढ़ गई है। चुनौती सपा और बसपा के हिस्से के वोट शिफ्ट कराना, जाट वोटों का बिखराव रोकना सबसे बड़ी चुनौती है।

इस बार बड़ी चुनौती
साल 2014 के लोकसभा चुनाव पर मुजफ्फरनगर दंगे और मोदी लहर का साफ असर नजर आया था। यहां से सांसद बनें डॉ सत्यपाल सिंह ने 42,3475 लाख वोट हासिल किए थे। जबकि यहां पर सपा, रालोद और बसपा क्रमश: दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रही थी। इन तीनों का इस बार गठबंधन हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2014 की ही बात करें तो तीनों के कुल वोट 55,4868 लाख थे। यानि गठबंधन की लिहाज से देखें तो भाजपा के सामने इस बार कड़ी चुनौती होगी।
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