सेना के मेस गोदाम से पकड़ा गया तेंदुआ कानपुर चिड़ियाघर में फिलहाल शांत है। जंगल के इस राजकुमार को फिर से आजाद होने के लिए तीन माह की निगरानी से गुजरना होगा। चिड़ियाघर में उसके व्यवहार पर गहन निगाहें रहेंगी। इसमें पास हुआ तो जंगल में छोड़ा जाएगा, नहीं तो पूरी जिंदगी कैद में यानी चिड़ियाघर में गुजारनी होगी।
छोटे पिंजरे से बड़े में पहुंचा
तेेंदुआ चिड़ियाघर पहुंचने के बाद छोटे से बड़े पिंजरे में पहुंच गया है। वहां के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. यूसी श्रीवास्तव उसका उपचार कर रहे हैं। साथ ही उसके व्यवहार पर भी नजर रखे हैं। डॉ. श्रीवास्तव के मुताबिक बृहस्पतिवार देर रात करीब तीन बजे उसे चिड़ियाघर लाया गया। उसे होश तो जल्द ही आ गया था, पर वह कई घंटे बेहद गुस्से में रहा।
नहलाया गया पर खाया कम
शुक्रवार को चिड़ियाघर में तेंदुए को नहलाया गया। इस दौरान उसने पानी से खूब मस्ती की। तेंदुआ चमक उठा। वजन 50 किलो से कम आंका जा रहा था, लेकिन तौल में 60 किलो का निकला। तंदुरुस्ती अच्छी है। इतना वजन तो तब है, जब उसने तीन दिन से कुछ खाया नहीं है। उम्र पांच साल है। तेंदुआ औसत वजन से ज्यादा है। इससे माना जा रहा है कि यह अच्छा शिकारी है। शुक्रवार सुबह उसे चार किलो मटन दिया गया, जो उसने शाम सात बजे तक केवल चखा ही। अक्सर तेंदुआ रात को ही खाता है। माना जा रहा है कि रात को वह सारा मीट चट कर देगा।
घाव भरने में लगेगा समय
तेंदुए को रेस्क्यू करने वाले कानपुर चिड़ियाघर के वेटनरी चिकित्सक डॉ. आरके सिंह और डॉ. यूसी श्रीवास्ताव के अनुसार तेंदुए के दायें पंजे के नाखून टूटे हैं। खासतौर पर दो नाखून तो बुरी तरह जख्मी हैं। नाखून टूटे होने पर वह जंगल में आसानी से शिकार नहीं कर सकता।
छोड़ा तो फिर घुसेगा शहर में
विशेषज्ञों के मुताबिक चोट लगने और शिकार न करने के कारण ही उसने आबादी का रुख किया। यदि इस हालत में उसे छोड़ा तो वह फिर से शहर में घुसेगा। घाव की ड्रेसिंग कर दी गई है। इंफेक्शन है। उसे अलग रखकर इलाज चलेगा।
यूं होगी परीक्षा
माना जा रहा है कि करीब तीन माह तक उसका उपचार होगा। इसके बाद देखा जाएगा कि क्या वह जंगल में शिकार कर सकता है। उसके नाखूनों का परीक्षण होगा। इसके लिए उससे शिकार कराकर भी देखा जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो ही उसे जंगल में छोड़ा जाएगा।
तीन माह बाद होगा नामकरण
यदि यह तेंदुआ परीक्षा में नाकाम रहा और उसे चिड़ियाघर में ही रहना पड़ा तो उसका नामकरण कर दिया जाएगा। नियमानुसार जो जानवर चिड़ियाघर में पैदा होते हैं, उनका नाम तत्काल रख दिया जाता है। जबकि जो जानवर पकड़कर लाए जाते हैं, उनके व्यवहार पर शोध होता है। इलाज होता है। इसके बाद जंगल में छोड़ने के लिए प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट से अनुमति ली जाती है। यदि जानवर जंगल में नहीं जा पाता और चिड़ियाघर का ही होकर रह जाता है तो उसका नामकरण कर दिया जाता है।
संजय वन में किया होश में आने का इंतजार
मेरठ। तेंदुए को ट्रेंक्यूलाइज करने के बाद टीम उसे संजय वन लेकर आई थी। यहां उसका डॉ. आरके सिंह ने चेकअप किया। पूरी तरह होश में आने का इंतजार किया। उसे पानी पिलाया गया। जब वह सामान्य व्यवहार करने लगा तो दोपहर में तीन बजे टीम कानपुर चिड़ियाघर के लिए लेकर रवाना हुई।
दुआ कीजिये कोई तेंदुआ घायल न हो
तेंदुआ घायल होने पर अपना शिकार नहीं कर पाता। जंगल में उसका पाला तेज दौड़ने वाले जानवरों से पड़ता है। घायल हालत में वह शिकार करने में असमर्थ हो जाता है। इसलिए आसान शिकार की तलाश में शहर का रुख करता है। डॉ. आरके सिंह के मुताबिक माना जा रहा है कि तेंदुआ काफी दिनों से मेरठ शहर के आसपास रहकर अपना शिकार पूरा कर रहा था। घायल हालत में तेंदुआ जंगल में नहीं टिकता है। लोगों को दिखाई तो मंगलवार को दिया। ऐसे में दुआ ही की जा सकती है कि कोई तेंदुआ घायल न हो, वरना वह शहर में एंट्री मार देगा।
सबसे अलग रखे जाते हैं तेंदुए
चिड़ियाघर में तेंदुए सबसे अलग रखे जाते हैं। वजह इनकी फुर्ती और उछलकूद है। टाइगर का बाड़ा ऊपर से कवर नहीं रहता। तेंदुआ छलांग ऊंची मारता है इसलिए बाड़ा ऊंचा और कवर रहता है। तेंदुओं को मिक्स नहीं रखा जाता, खासतौर पर जब वह घायल हालत में होते हैं। पूरी तरह जब तक ठीक नहीं हो जाते, एकदम अलग रखते हैं।
मेरठ से लाए तेंदुए का अभी हम उपचार कर रहे हैं। वह जख्मी है। उसका उपचार पूरा होगा, तभी स्थिति साफ होगी कि उसे जंगल में छोड़ा जा सकता है या नहीं। फिलहाल वह शांत है।- डॉ. यूसी श्रीवास्तव, वरिष्ठ चिकित्सक कानपुर चिड़ियाघर
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चिकित्सकों को कहा गया है कि मेरठ से लाए तेंदुए का गंभीरता से उपचार करें। उसके व्यवहार का भी अध्ययन किया जा रहा है। - दीपक कुमार निदेशक कानपुर चिड़ियाघर