एक ही नेता की रैली। वही एक जैसे नेता। माहौल भी एक जैसा। बदला तो सिर्फ रैली का स्थान और उसके इंतजाम करने वाले। महज दो साल पहले की बात है। लोकसभा चुनाव के दौरान दो फरवरी-2014 को शताब्दीनगर में नरेंद्र मोदी की रैली हुई थी। इसकी तैयारियों में तत्कालीन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने बारीक से बारीक व्यवस्था पर नजर बनाये रखी। यही नहीं, कार्यकर्ताओं को निर्देश और उनका दायित्व तय करने के साथ-साथ रैली स्थल पर अपने हाथों से बल्लियों की रस्सी तक बांधी थी।
लेकिन, उनके प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद हुई सहारनपुर रैली में वह पूरी तरह हाशिये पर नजर आए। बदले हालात से जहां उनके समर्थक हैरत में हैं, तो विरोधियों का खुश होना भी लाजिमी है। एक माह पहले तक जो वाजपेयी कभी अग्रिम पंक्ति में हुआ करते थे, सहारनपुर रैली में पिछली पंक्ति में भी नजर नहीं आये। रैली की तैयारियों के लिए वह सहारनपुर नहीं बुलाये गये। मुख्य मंच तो छोड़िये, सहायक मंच पर भी उनका स्थान तय नहीं था।
आयोजक मंडल से जुड़े लोगों की मानें तो वाजपेयी का नाम मंच पर था। लेकिन, वाजपेयी का कहना है कि उन्हें इसकी सूचना नहीं थी। जबकि नियमानुसार मंच पर बैठने वालों की सूची पहले से तैयार हो जाती है और उन्हें सूचना भी दे दी जाती है, लेकिन वाजपेयी के साथ ऐसा नहीं हुआ।
भीड़ में बैठकर सुना भाषण
मंच पर बैठना तो दूर एक ऐसे प्रदेश अध्यक्ष को जिसके कार्यकाल में भाजपा ने अब तक के इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल देखा हो (लोकसभा चुनाव में यूपी में 73 सीटों पर जीत), उसका नाम तक मंच से नहीं पुकारा गया। वह नेता जनता के बीच पीछे की तरफ बैठकर प्रधानमंत्री का संबोधन सुनता रहा और किसी ने उसे पहचान कर आयोजकों को यह बताने तक का प्रयास नहीं किया कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सभा में बैठे हैं।
विरोधी खेमों का दुष्प्रचार
बृहस्पतिवार को वाजपेयी के साथ हुए इस व्यवहार पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। एक विरोधी खेमे ने तो यहां तक प्रचार शुरू कर दिया है कि वाजपेयी सभा में गए ही नहीं। जबकि, एक विरोधी खेमा उनके साथ हुये व्यवहार को जैसे को तैसा होने की बात कह रहा है। इस गुट का कहना है कि डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने भी अपने कार्यकाल में किसी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष को सम्मान देना तो दूर, ठीक से बात तक नहीं की। सभी को हाशिये पर रखा। अब अगर उन्हें हाशिये पर रखा गया है तो क्या गलत है। वहीं इस पूरे मामले को लेकर उनके समर्थक हैरत में हैं।
शहर विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा असर
वाजपेयी को लेकर जो घेराबंदी हुई है, उसका असर पूरी तरह शहर विधानसभा सीट पर जाता नजर आ रहा है। इस उपेक्षा और पार्टी की खेमेबंदी से उनके समर्थकों में जहां मायूसी होगी, वहीं विपक्ष चुनाव में भी उनकी घेरेबंदी करेगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।