यात्रा के दसवें दिन गाजीपुर में शांति मार्च कर रहे किसानों पर पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और लाठी फटकारी। मुजफ्फरनगर दंगे के पांच साल बाद किसान पहली बार जाति और धर्म का भेदभाव छोड़कर एकसुर में दिल्ली की तरफ बढ़े। किसानों के समर्थन में पूरा विपक्ष उतर आया है। भाजपा सरकार के रणनीतिकारों से कहीं न कहीं चूक हुई है। विपक्ष को घेरेबंदी का मौका मिला, क्योंकि लोकसभा चुनाव नजदीक है, ऐसे में किसान क्रांति यात्रा के किसानों पर पड़ी लाठियों का मुद्दा चुनाव में खूब गूंजेगा। महा गठबंधन का खाका लगभग तैयार है। सपा, रालोद समेत अन्य दलों की सहमति लगभग बन चुकी है। ऐसे में पश्चिमी की किसान बिरादरी की नाराजगी चुनावी समीकरण पर असर डाल सकती है। रालोद के पूर्व विधायक डॉ. अजय कुमार कहते हैं कि किसानों पर लाठियां बरसाना सरकार की हताशा का परिणाम है। सरकार आखिरकार किसानों को दिल्ली क्यों नहीं जाने देना चाहती है। अब लोग सरकार की मंशा समझ चुके हैं।
दूसरी तरफ भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के बेटे गौरव टिकैत कहते हैं कि किसान एकजुट हो गए हैं। आंदोलन से किसान पीछे हटने वाले नहीं है। पानी की बौछार में किसान रोज रहते हैं, सरकार को हिसाब देना ही पड़ेगा।
किसानों की समस्या का होगा समाधान: सत्यपाल सिंह
केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने कहा सरकार किसानों की समस्याओं का प्राथमिकता के आधार पर समाधान कर रही है। चीनी मिलों का विस्तारीकरण किया है, भुगतान की स्थिति में सुधार हुआ है। फसलों का बेहतर दाम दिए हैं। किसान क्रांति यात्रा के प्रतिनिधियों से सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत हुई है। समन्वय का प्रयास किया है। सरकार किसानों के प्रति बेहद गंभीर है।
किसानों की बात क्यों नहीं सुनना चाहती सरकार : अजित सिंह
रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह ने कहा कि सच सबके सामने हैं। सरकार किसानों को दिल्ली में प्रवेश से रोक रही है। किसानों का शांतिपूर्ण मार्च हरिद्वार से दिल्ली के बॉर्डर तक चला। किसी को कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन सरकार को दिल्ली में प्रवेश करते ही परेशानी हो गई। आखिर सरकार किसानों की बात क्यों नहीं सुनना चाहती है। किसान की समस्याएं हैं और सरकार को अपनी समस्याएं बताने के लिए आए थे, लेकिन जैसा व्यवहार किया है, वह सबके सामने आ गया है। किसानों को फसलों का वाजिब दाम चाहिए। अन्य तमाम समस्याएं हैं।
बाबा टिकैत के तेवर में आई भाकियू
भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की किसानों की मांगों के मुद्दे पर सरकारों से टकराव की उनकी नेतृत्व क्षमता ने भाकियू को ताकत दी थी। बड़े आंदोलनों का भाकियू का इतिहास रहा है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के वर्ष 2011 में निधन के बाद भाकियू ने पहली बार किसान क्रांति यात्रा का बिगुल फूंक कर प्रदेश और केंद्र की सरकारों की नीतियों पर सवाल ही नहीं उठाए, बल्कि अपनी मांगों पर सोचने को विवश किया है। किसान क्रांति यात्रा के अंतिम चरण में अब भाकियू ने बाबा महेंद्र टिकैत की तरह तेवर अपना लिए हैं।
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