महापंचायत ने क्या यूपी में राजनीति में बदलाव का संकेत दे दिया है ? इसे लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। जिस तरह से महापंचायत में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की खाप एकजुट हुई है, उससे साफ है कि आगामी चुनाव को लेकर भाजपा की मुश्किलें बढ़ रही है।
मुजफ्फरनगर में संयुक्त किसान मोर्चा की जीआईसी के मैदान पर रविवार को हुई महापंचायत ने क्या यूपी में राजनीति में बदलाव का संकेत दे दिया है ? यह सवाल महापंचायत में जुटी भीड़ के बाद खड़ा हो रहा है।
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लोक भवन लखनऊ के अफसर भी महापंचायत में स्थानीय भागीदारी की जानकारी लेते रहे। बाहरी राज्यों के किसानों को छोड़कर स्थानीय किसानों की भागीदारी कितनी रही ? चुनावी गणित में जीत के लिए क्या नए बदलाव अहम होंगे, ऐसे तमाम विषयों पर भाजपा भी भरपाई की तैयारी करेगी। चुनाव से पहले खाप और किसानों को साधना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।
केंद्र सरकार की कृषि नीतियों के खिलाफ आक्रोशित किसानों ने यदि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा से बेरुखी बरती तो पार्टी के लिए नुकसान की भरपाई मुश्किल साबित होगी। महापंचायत में जिस तरह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की खाप एकजुट हुई है, उससे साफ है कि भाजपा की मुश्किलें बढ़ रही है।
वर्ष 2017 के चुनाव में मतदाता के रुप में ज्यादातर किसान जातियों के बीच भाजपा ‘फेवरेट’ पार्टी साबित हुई थी। अब की बार किसानों के बीच ‘कमल’ को लेकर बंटवारा तय है। किसान महापंचायत में उमड़ी भीड़ के संदर्भ में भाजपा के रणनीतिकारों ने गोपनीय रिपोर्ट ही नहीं ली, बल्कि पल-पल की नजरें रखी गई।
विपक्षी पार्टियां तलाश रही ‘संजीवनी ’
किसान महापंचायत को जिस तरीके से रालोद, सपा और कांग्रेस नेताओं ने समर्थन किया। किसानों की भोजन व्यवस्था संभाली। उससे ये तय है कि किसानों की भाजपा सरकारों के खिलाफ एकजुटता को विपक्षी पार्टियां अपनी ‘संजीवनी’ के तौर पर देख रही है।